हिन्दी और अंग्रेज़ी के समाचार पत्रों की तरह उर्दू के समाचार पत्रों में भी आपस में काफी मुकाबला देखने को मिलता है। अंतर सिर्फ इतना है की एक ओर जहां हिन्दी और अंग्रेज़ी के समाचारपत्र खबरों के लिए मुकाबला करते हैं वहीं उर्दू के अखबार सिर्फ इस बात के लिए एक दूसरे से मुकाबला करते हैं की अधिक से अधिक मंत्रियों से कैसे जान पहचान बनाई जाए और कैसे ड़ी ए वी पी में बड़े अधिकारियों से मिलकर अधिक से अधिक विज्ञापन हासिल किया जाए। उर्दू अखबारों में यह भी एक चलन है की यहाँ हर अखबार बड़े बड़े मुस्लिम विद्दुयानों को अपने करीब रखने की कोशिश करता है। मगर इस बार उर्दू अखबार वालों को एक ऐसी परीशनी का सामना है की सब के सब सरकार के वीरुध एकजुट नज़र आ रहें हैं। हुआ यह है की पिछले कुछ महीनों से उर्दू अखबार को ड़ी ए वी पी के विज्ञापन बहुत कम मिल रहें हैं। और जहां तक उर्दू अखबारों का सवाल है तो उर्दू अखबार की आम्दनी का जरिया बहुत हद तक ड़ी ए वी पी के विज्ञापन ही होते हैं। मगर ऐसा देखा जा रहा है की यू पी ए सरकार पता नहीं क्यूँ उर्दू वालों को विज्ञापन नहीं के बराबर दे है। हद तो यह है की जो विज्ञापन सिर्फ उर्दू वालों के लिए होते हैं वो भी इंग्लिश अखबारों में छपते हैं। अब चूंकि इंग्लिश या हिन्दी अखबारों की तरह उर्दू मैं न तो ब्लाक मेल करने का चलन है और न ही इन में प्राइवेट विज्ञापन ज्यादाह होते हैं इस लिए उर्दू अखबार के बचे रहने के लिए ड़ी ए वी पी विज्ञापन ज़रूरी है। मगर यू पी ए सरकार उर्दू अखबार के साथ सौतेला रवैया अपना रही है। सरकार की इसी बेरुखी से नाराज़ होकर उर्दू अखबार के संपादकों और मालिकों ने प्रधान मंत्री और दूसरे मंत्रियों से मिलने का सिलसिला शुरू कर दिया है। गत दिनों इसी सिलसिले में हिंदुस्तान एक्सप्रेस के परवेज़ सुहाइब अहमद, हमारा समाज के खालिद अनवर, सहाफ़त के हसन शुजा और अखबार मशरिक़ के वसीमूल हक़ ने मौलाना अर्शद मद्नी और सांसद बदरुद्दीन अजमल के साथ प्रधान मंत्री से मुलाकात की। प्रधान मंत्री हालांकि इस टीम को आश्वासन दिया की वो उर्दू अखबारों की समस्याओं पर ग़ौर करेंगे। उनहों ने अपने प्रैस सलाहकार से भी कहा की इन अखबारों के समस्याओं को हल करने की कोशिश करें। इस पर अमल कब होता है यह तो बाद में पता चलेगा।
चूंकि सरकारी विज्ञापन नहीं मिलना एक बड़ी समस्या है इस लिए इस सिलसिले में उर्दू अखबार के संपादकों ने मंत्रियों और ऐसे लोगों से मिलना शुरू कर दीया है जिनसे कोई लाभ हो सकता है। वैसे तो उर्दू अखबार की मदद के लिए मौलना लोग और कई सांसद भी सामने आ गए हैं मगर कई लोग ऐसे भी हैं जिंका कहना है की अखबार वाले क्या अपनी समस्या खुद हल नहीं कर सकते जो उन्हें मौलाना लोगों की मदद लेनी पड रही है। इस सिलसिले में जिन लोगों ने खुलकर उर्दू वालों की मदद करने का वादा किया है और कर भी रहें हैं उनमें सांसद मोहम्मद अदीब, मौलाना अहमद बुखारी, मौलाना अर्शद मदनी और मौलाना वाली रहमनी का नाम उललेखनिए है। इन सभी का यही कहना है और यह सही भी कह रहें हैं की सरकार उर्दू अखबार के साथ नाइंसाफी कर रही है। गत दिनों दिल्ली में एक प्रोग्राम के दौरान सांसद मोहम्मद अदीब ने कहा की उर्दू वालों के साथ सब से बड़ा मसला यह है की उनका कोई संगठन नहीं है जो उनके लिए आवाज़ बुलंद कर सके। इसी प्रोग्राम में कोलकाता के मशहूर अखबार आज़ाद हिन्द के संपादक और सांसद सईद मलीहाबादि ने कहा की हर अखबार अकेले अपनी समस्या हल नहीं कर सकता। इस के लिए ज़रूरी है की संगठन बनाया जाए और फिर किसी समस्या के हल के लिए मिलकर कोशिश की जाये. कुल मिला कर पहली बार ऐसा देखने में आ रहा है की उर्दू के सभी अखबार वाले एक प्लातेफ़ोर्म पर आ गए हैं और सब मिलकर इस समस्या का हल निकालने की कोशिश में लगे हैं। मगर बड़े अफसोस की बात यह है की राजनीती यहाँ भी हो रही है। एक ओर जहां हर कोई इस अवसर का लाभ उठा कर अपनी अधिक से अधिक पहुँच नेताओं तक बनाने की कोशिश में लगा है वहीं उर्दू के एक बड़े अखबार राष्ट्रीय सहारा के संपादक अज़ीज़ बर्नी ने खुद को इस पूरे मामले से अलग रखा हुआ है। जिस पार्कर चुनाओ के समय मुसलमानों का वोट बाँट जाता है ठीक उसी तरह यहाँ भी थोड़ी बहुत राजनीती हो रही है और उर्दू वाले एक दूसरे को काटने में लगे हुये हैं। इस अवसर पर यदि सबने मिल कर काम नहीं किया तो इसका एक बड़ा नुकसान आने वाले दिनों में सब को होगा। पता नहीं यह बात उर्दू अखबारों के संपादकों या मालिकों को क्यूँ समझ में नहीं आ रही है। सुनने में यह भी आ रहा है की सरकार को कुछ उर्दू के संपादकों ने चार पाँच नाम दे कर यह कहा है की यही चार पाँच अखबार उर्दू के दिल्ली से निकलते हैं बाक़ी नहीं। इस के बाद से उन अखबारों में नाराज़गी पायी जा रही है जिसका नाम इस लिस्ट में नहीं है।
..............................................................ए एन शिबली का ब्लॉग
शनिवार, अगस्त 07, 2010
शुक्रवार, जुलाई 09, 2010
नितीश कुमार का रिपोर्ट कार्ड और असलियत
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी सरकार के पांचवे वर्ष में राज्य सरकार के क्रियाकलापों को लेकर एक रिपोर्ट कार्ड जारी किया है। जिसमें उन्हीं ने एक तरफ जहाँ यह बताने की कोशिश की है हमने पिछले चार सालों में क्या क्या कमाल क्या है वहीं उन्हों ने उर्दू और सिंस्कृत के टीचरों की नियुक्ति की बात भी काही है। जहाँ तक उनके 112 पृष्ठ के रिपोर्ट कार्ड का सवाल है तो वो यदि यह रिपोर्ट कार्ड नहीं भी जारी करते तो जनता को पता है की वो कुछ अच्छा काम कर रहें हैं मगर सच्चाई यह है की रिपोर्ट कार्ड की पूरी बात सही नहीं है। इस में शक नहीं की नितीश के आने के बाद बिहार की हालत बेहतर हुई है मगर इसका फाइदा सिर्फ उन्हीं लोगों को मिल रहा है जो तेज़ और चालाक हैं और जो नेताओं की चमचागीरी में लगे रहते हैं। इसकी कई मिसालें दी जा सकती हैं। उदाहरण के तौर पर बिहार में ज्यादाह तर गाँव में यह देखा गया है की बी पी एल में अमीरों का नाम है और ग़रीब बेचारे इसका लाभ नहीं ले पा रहें हैं। उसी प्रकार इन्दिरा आवास योजना का लाभ जरूरतमंदों को नहीं मिल रहा है। इन्दिरा आवास के तहत जितनी रकम टाई है उस से 5-10 हज़ार कम रकम मिलती है। बकी की रकम कई लोग रिश्वत के तौर पर लेते हैं। इनमें गाँव के छोटे मोटे दलाल मुखिया और ब्लॉक विकास अधिकारी भी शामिल रहता है.सिक्षा मित्रों को तनख्वाह तो मिल रही है मगर वो पाबंदी से स्कूल नहीं जाते और वो बच्चों को पढ़ाने के योग्य भी नहीं हैं। सिक्षा मित्रों की हालत यह है की उन्हें अपना पैसा लेने के लिए मुखिया को रिश्वत देनी पड़ती है। मुखिया के खिलाफ कोई सिक्षा मित्रा इस लिए नहीं बोलता की उसे पता है की मैं भी तो दूसरे का हक मार कर बे इमानी से टीचर बना हूँ। स्कूलों में चार्ट तो लगा है की फलां दिन फलां खाना बनेगा मगर कई कई दिन तक खाना नहीं बनाता। कुल मिलकर नितीश जी बहुत कुछ बेहतर करने की कोशिश की है मगर अफसरों की बे इमानी से ज़रूरतमंद इसका लाभ नहीं उठा पा रहें हैं।
जहाँ तक 27 हजार उर्दू शिक्षक, की नियुक्ति का सवाल है तो यह तो नितीश जी ने चुनाओ को देखकर किया है.चुनाओ के कारण ही उन्हों ने कहा की वह चाहते हैं कि प्रत्येक विद्यालय में एक उर्दू शिक्षक हो। कुल मिलकर नितीश काम अच्छा कहा जा सकता है मगर इस से इंकार नहीं किया जा सकता की उनकी जो योजनाएं हैं उसका लाभ सही लोग नहीं उठा पा रहें हैं। जहाँ तक अफसरों की बे इमानी का सवाल है तो वो अब भी उतने ही बे ईमान हैं जीतने लालू प्रसाद के ज़माने में थे.
जहाँ तक 27 हजार उर्दू शिक्षक, की नियुक्ति का सवाल है तो यह तो नितीश जी ने चुनाओ को देखकर किया है.चुनाओ के कारण ही उन्हों ने कहा की वह चाहते हैं कि प्रत्येक विद्यालय में एक उर्दू शिक्षक हो। कुल मिलकर नितीश काम अच्छा कहा जा सकता है मगर इस से इंकार नहीं किया जा सकता की उनकी जो योजनाएं हैं उसका लाभ सही लोग नहीं उठा पा रहें हैं। जहाँ तक अफसरों की बे इमानी का सवाल है तो वो अब भी उतने ही बे ईमान हैं जीतने लालू प्रसाद के ज़माने में थे.
शुक्रवार, जुलाई 02, 2010
गाजर मूली की तरह कट रहे हैं हमारे फौजी
माओवादी हमारे जवानों को मूली गाजर की तरह काट रहें है। हर आने वाले दिन देश के किसी न किसी हिस्से में हमारे जवान माओवादी या नक्सल का शिकार हो रहें हैं। पहले ऐसा होता था की इन हमलों में आम जनता मारी जाती थी मगर अब तो ऐसा लगता है की माओवादीओन ने खास तौर पर फौज को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। राजनेता मारे गए फौजियों के घर वालों को वक्ती तौर पर दिलासा तो दे देते हैं मगर उनके ज़ख़्मों को भर्ना आसान नहीं है। पता नहीं क्यों सरकार माओवाडीओन के प्रति नर्म रवैया अपनाती है। ऐसा शायद इस लिए है की माओवाडीओन के हमले में आम तौर पर या तो जनता या फिर फौजी मारे जाते हैं कोई नेता नहीं मारा जाता। अगर माओवादी नेता को निशाना बना शोरू कर दें तो शायद ऐसा नहीं होगा। सरकार को चाहिए की वह माओवाडीओन की गतिविधियों पर तुरंत सख्त कारवाई करे ताकि आइंदा से न कोई आम आदमी इन हमलों का शिकार हो और न ही फौजियों को अपनी जानें गंवानी पड़ें। ज़रा ग़ौर कीजिये जो फौजी हरी रक्षा के लिए दिन रात लगे रहते हैं उनकी जान बड़ी आसानी से चली जाती है.
मंगलवार, जून 29, 2010
साइना नेहवाल को बधाई
साइना नेहवाल को बधाई
हिंदुस्तानी बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल की खिताबी हैट ट्रैक पर उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। आज जो सफलता साइना को मिल रही है वही सफलता कभी सानिया मिर्ज़ा को मिली थी मगर धीरे धीरे सानिया की सफलता का ग्राफ घटता गया। साइना ने तो सानिया से ज्यादाह कमाल किया है। साइना दो नंबर पर पहुँच चुकी हैं। ऐसी आशा है की वो नंबर एक पर भी पहुँच जाएँ मगर इसे वो बरकरार कब तक रखेंगी यह अहम सवाल है। साइना को चाहिए की वो ग्लैमर से बचें नहीं तो उनकी हालत भी सानिया जैसी ही हो जाएगी.
हिंदुस्तानी बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल की खिताबी हैट ट्रैक पर उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। आज जो सफलता साइना को मिल रही है वही सफलता कभी सानिया मिर्ज़ा को मिली थी मगर धीरे धीरे सानिया की सफलता का ग्राफ घटता गया। साइना ने तो सानिया से ज्यादाह कमाल किया है। साइना दो नंबर पर पहुँच चुकी हैं। ऐसी आशा है की वो नंबर एक पर भी पहुँच जाएँ मगर इसे वो बरकरार कब तक रखेंगी यह अहम सवाल है। साइना को चाहिए की वो ग्लैमर से बचें नहीं तो उनकी हालत भी सानिया जैसी ही हो जाएगी.
रविवार, मई 30, 2010
सुपर ३० का धमाका

आनंद कुमार की निगरानी में सुपर ३० ने लगातार तीसरे साल कमाल किया है। इस बार भी उसके सभी ३० लड़के आई आई टी के लिए सेलेक्ट हुए । इस शानदार आनंद कुमार और उनकी टीम को जितनी भी मुबारकबाद दी जाये कम है। कमाल कि बात यह है कि यह सभी लड़के ग़रीब घरों के होते है। इनसे कोई फीस भी नहीं ली जाती। आनंद कुमार का सुपर ३० उन सभी कोचिंग संस्थाओं के लिए मिसाल है जो कोचिंग के नाम पर बच्चों को लूटते हैं और समाचार पत्रों में बड़े बड़े विज्ञापन दे कर उन्हें ठगते हैं। आनंद कुमार का तो यह भी कमाल है कि वोह किसी से पैसा नहीं लेते। ऐसे लोग अगर देश में दस बीस हो जायें तो पूरे देश का भला हो जाये। ऐसी कामयाबी के लिए सब से ज़रूरी है इमानदारी जो कि आनंद कुमार में कूट कूट कर भरी हुई है। उनका नाम तो अब विदेशों में भी हो रहा है। ऐसे में उन पर पैसों कि बरसात हो सकती है मगर इस के बावजूद वोह किसी से पैसा लेना नहीं चाहते और ग़रीब बच्चों की मदद में लगे रहना चाहते हैं। आनंद और उनकी टीम को एक बार फिर बहुत बहुत मुबारकबाद। आशा है वोह यह कारनामा आगे भी अंजाम देते रहेंगे।
बुधवार, मई 19, 2010
बिगड़े नवावों पर करवाई ज़रूरी
एक तरफ तो भारतीय क्रिकेट टीम को इंडीज़ में शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा वहीँ दूसरी भारत के कुछ खिलाडी नाच गाने में लगे रहे। सच्चाई यह है कि कुछ खिलाडिओं ने खुद को देश से ऊपर समझना शुरू कर दिया है। वोह यह भूल जाते हैं कि वोह देश के लिए खेल कर कोई अहसान नहीं कर रहे है बल्कि देश उन्हें खेलने का अवसर देकर उन पर अहसान कर रहा है। हालाँकि बी सी सी आई ने छः बिगड़े खिलाडिओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है मगर ज़रूरी है कि इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई कि जाए। इन्हें इसका अहसास करना ज़रूरी है कि तुम्हारे अलावः भी देश में बहुत से ऐसे खिलाडी हैं जो अवसर मिलने पर देश के लिए बेहतर खेल पेश कर सकते हैं। जिन बड़े खिलाडिओं का खेल सही नहीं था उसे सब से पहले तो टीम से बहार किया जाये और जो पब में झगडा में शामिल थे उनपर कार्रवाई भी कि जाए.
गुरुवार, फ़रवरी 04, 2010
कानून से ऊपर हैं यह लोग

फिल्म स्टार शाहरुख़ खान के एक बयां पर बाल ठाकरे और उनके लोग जो हंगामा कर रहे हैं उसे किसी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता। चूँकि बाल ठाकरे रहज ठाकरे या फिर उद्धव ठाकरे जैसे लोगों के विरुद्ध कोई करवाई नहीं होती इस लिए वोह आये दिन देश के दुसरे लोगों पर अपनी मर्ज़ी थोपते रहते है । पाकिस्तानी खिलाडिओं के बारे मैं शाहरुख़ ने जो कुछ भी कहा है वही सोच अधिकतर लोगोंम की है । जब पाकिस्तानी खिलाडी आई पी एल के लिए नहीं चुने गए तो भारत के लगभग सभी खेल पत्रकारों को इस पर आश्चर्ज हुआ था और सबने यही लिखा था कि पाकिस्तानी खिलाडिओं को ज़रूर लेना चाहिए था। कई समाचार पत्रों ने तो इस पर सम्पदाकिये भी लिखा था। हर सच्चा इंसान यही कहेगा कि यदि कोई देश ग़लती कर रहा है या फिर उस देश के कुछ लोग भारत के विरूद्ध हैं तो फिर उसकी सजा उस खिलाडी को क्यों मिले जिसकी कोई ग़लती नहीं है।
सच्चाई यह है कि बालासाहब ठाकरे और राज ठाकरे जैसे लोगों को बदमाशी करनी होती है और वोह उसके लिए आये दिन कोई न कोई बहना तलाशते रहते हैं। उन्हें अमिताभ बच्चन जैसे लोगों से भी ताक़त मिलती है जो इतने बड़े स्टार होने के बावजूद ठाकरे के घर जा कर उन्हें फिल्म दिखाते हैं। जो लोग आये दिन मार पीट कि राजनीती करते हैं । मुंबई से बहार के लोगों के साथ बुरा बर्ताव करते हैं उनसे अमिताभ का ऐसा प्रेम दर्शाता है कि वोह डर गए हैं और इसी वजह से शाहरुख़ जैसे बड़े स्टार का साथ देने के बजाये ठाकरे का साथ दे रहे हैं। ठाकरे जैसे लोगों को इतनी छूट देना उचित नहीं हैं। यह लोग धीरे धीरे देश के लिए दर्दे सर बनते जा रहे हैं। यदि उनके खिलाफ करवाई नहीं हुई तो आने वाले दिन में इनकी जो हरकत होगी उसे रोक पाना मुश्किल हो जायेगा।
मंगलवार, जनवरी 12, 2010
राजनेता को जनता की चिंता नहीं
गत सप्ताह दो ऐसी घटनाएं हुईं जिस से यह आसानी से अंदाज़ा लग जाता है कि नेताओं को जनता कि कोई चिंता नहीं है। वह राजनीती में सिर्फ और सिर्फ अपना भला करने के लिए आते हैं। पहली घटना दक्षिण भारत कि है वहां एक पुलिस वाला बम का शिकार हो कर तड़प तड़प कर सड़क पर मरता रहा मगर वहां से गुजरने वाले नेताओं ने उसकी चिंता नहीं की और उसे उसके हाल पर छोड़ दिया। बाद में इस पुलिस वाले की मौत हो गयी। ज्ञात रहे कि यह वह पुलिस वाला था जो चन्दन तस्कर वीरप्पन को मारने वाली टीम का हिस्सा था। जब नेता ने एक बड़े पुलिस वाले कि सुध लेने कि कोशिश नहीं कि तो फिर एक आम जनता यह कैसे आशा कर सकती है कि जिस व्यक्ति को उस ने अपना कीमती वोट देकर दिलाया है वह परीशानी में आपका साथ देगा। ऐसे लोग आपका साथ कभी नहीं दे सकते।
उसी तरह इन दिनों महंगाई ने जनता का जीना हराम किया हुआ है। इस सिलसिले में जब पत्रकारों ने कृषि मंत्री शरद पवार ने पूछा कि महंगाई कब कम होगी तो उनका कहना था कि मैं ज्योतिषी नहीं हूँ जो यह जानूं। ज़रा सोचिये जब मंत्री को यह पता नहीं होगा तो यह किसे पता होगा। मंत्री जी तो कौन बताये कि मामूली सी महंगाई से आम जनता को परीशानी हो जाती है और अभी तो बेतहाशा महंगाई बढ़ रही है। आम जनता के घर का पूरा सिस्टम ही गड़बड़ हो गया है। ऐसे में मंत्री का ग़ैर जिम्मेदाराना बयान क्या साबित करता है। सच्चाई यह है कि आज राजनीती में ज्यादह तर ऐसे ही लोग हैं जिन्हें जनता कि फ़िक्र नहीं है वह राजनीती में हैं टी सिर्फ इसलिए कि इस दौरान अधिक से अधिक पैसे बना लिए जाएँ ताकि आने वाली नस्ल आराम से जीवन गुज़ार सके.
उसी तरह इन दिनों महंगाई ने जनता का जीना हराम किया हुआ है। इस सिलसिले में जब पत्रकारों ने कृषि मंत्री शरद पवार ने पूछा कि महंगाई कब कम होगी तो उनका कहना था कि मैं ज्योतिषी नहीं हूँ जो यह जानूं। ज़रा सोचिये जब मंत्री को यह पता नहीं होगा तो यह किसे पता होगा। मंत्री जी तो कौन बताये कि मामूली सी महंगाई से आम जनता को परीशानी हो जाती है और अभी तो बेतहाशा महंगाई बढ़ रही है। आम जनता के घर का पूरा सिस्टम ही गड़बड़ हो गया है। ऐसे में मंत्री का ग़ैर जिम्मेदाराना बयान क्या साबित करता है। सच्चाई यह है कि आज राजनीती में ज्यादह तर ऐसे ही लोग हैं जिन्हें जनता कि फ़िक्र नहीं है वह राजनीती में हैं टी सिर्फ इसलिए कि इस दौरान अधिक से अधिक पैसे बना लिए जाएँ ताकि आने वाली नस्ल आराम से जीवन गुज़ार सके.
गुरुवार, दिसंबर 17, 2009
धंधा है पर गन्दा है.
गत दिनों सुप्रीम कोर्ट की एक ऐसी दलील आई जिसे भारतीय समाज में आसानी से स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि दुनिया के सब से पुराने धंधे वैश्यावृति पर अगर कानून बनाकर या फिर किसी और तरीके से रोक लगाना मुमकिन नहीं हो रहा है तो फिर इसे कानूनी दर्जा ही क्यों न दे दिया जाये। कोर्ट कि यह टिपण्णी बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि हर तरह कि कोशिश के बावजूद इस बुराई पर काबू नहीं पाया जा सका है। अलबत्ता इस के अंदाज़ में भी तब्दीली आ गयी है। कुछ साल पहले तक यह गन्दा धंधा चोरी छुपे होता था मगर अब यह खुले आम हो रहा है। पहले दलाल लोगों को वेश्या के पास लाते थे अब बिंदास टाइप कि लड़कियां काल गर्ल का काम कर रही है और इस धंधे में वोह किसी दलाल के चक्कर में पड़ने के बजाये खुद ही अपना नंबर बाँट रही हैं और घंटों में लाखों पैसा कमा रही हैं। जी हाँ अंग्रेज़ी अखबार में मसाज सेण्टर के नाम पर जो विज्ञापन छपता है वोह असल में काल गर्ल का ही नंबर होता है। इन में कुछ तो दलाल के नंबर होते हैं और कुछ पर आप सीधा काल गर्ल से ही बात कर सकते हैं। इन काल गर्ल के चार्ज अलग अलग होते हैं। इन से होटल में संपर्क करें तो उसका चार्ज अलग होगा इन्हें आप जहाँ चाहें ले जायें उसका चार्ज अलग होगा। ऐसी लड़कियां भी हैं जो एक साथ कई लोगों के साथ जाने को तैयार हैं बस आपको उसका रेट देना होगा। कुल मिला कर दुनिया के दुसरे देशों कि तरह भारत में भी वैश्यावृति किसी न किसी शक्ल में मौजूद है।
अब सवाल यह है कि क्या यदि यह बुराई बड़े पैमाने पर हो रही है और इस पर रोक भी नहीं लग पा रहा है तो क्या इसे जायज़ करार दिया जाना उचित होगा। भारत जैसे देश में इसका सीधा सा जवाब यह है कि इस बुराई को किसी भी तरह से जायज़ नहीं ठाहराया जा सकता। इस से इनकार नहीं किया जा सकता कि बुराई भारत के छोटे बड़े हर शहर में मौजूद है। ग़रीब से ग़रीब और अमीर से अमीर लड़कियां इस बुराई में लिप्त हैं। मगर इस का मतलब यह नहीं है कि यदि बुराई बड़े पैमाने पर हो रही है तो उसे बुराई नहीं मन जाये। यदि इस बुराई को जायज़ ठाहराया जाता है तो इस का समाज पर बहुत बुडा असर पड़ेगा। जो वैश्याएँ या काल गर्ल आज कुछ हद तक शर्माती हैं वह फिर खुलेआम अपने ग्राहक से बदतमीजी करती नज़र आयेंगे। कुल मिलकर वैश्यावृति चाहे कितनी ही पुरानी तिजारत क्यों न हो यह एक बहुत बड़ी बुराई है और इसे भारतीय समाज में उचित नहीं ठाहराया जा सकता।
अब सवाल यह है कि क्या यदि यह बुराई बड़े पैमाने पर हो रही है और इस पर रोक भी नहीं लग पा रहा है तो क्या इसे जायज़ करार दिया जाना उचित होगा। भारत जैसे देश में इसका सीधा सा जवाब यह है कि इस बुराई को किसी भी तरह से जायज़ नहीं ठाहराया जा सकता। इस से इनकार नहीं किया जा सकता कि बुराई भारत के छोटे बड़े हर शहर में मौजूद है। ग़रीब से ग़रीब और अमीर से अमीर लड़कियां इस बुराई में लिप्त हैं। मगर इस का मतलब यह नहीं है कि यदि बुराई बड़े पैमाने पर हो रही है तो उसे बुराई नहीं मन जाये। यदि इस बुराई को जायज़ ठाहराया जाता है तो इस का समाज पर बहुत बुडा असर पड़ेगा। जो वैश्याएँ या काल गर्ल आज कुछ हद तक शर्माती हैं वह फिर खुलेआम अपने ग्राहक से बदतमीजी करती नज़र आयेंगे। कुल मिलकर वैश्यावृति चाहे कितनी ही पुरानी तिजारत क्यों न हो यह एक बहुत बड़ी बुराई है और इसे भारतीय समाज में उचित नहीं ठाहराया जा सकता।
गुरुवार, नवंबर 26, 2009
अल्लाह करे ऐसा फिर कभी न हो

मुंबई में पर हुए आतंकवादी हमलों को एक साल बीत चुके हैं। इस अवसर पर आज हमें उन सभों के साथ होना चाहिए जिनके रिश्तेदार इस में मारे गए। इस आतंकवादी हमले में जिस किसी का भी हाथ था उसे जितनी भी सज़ा दी जाए कम होगी। आखिर इस तरह की दहशतगर्दी फैलाने वाले यह क्यों नहीं समझते कि उन्हों ने मासूम लोगों कि जान ले कर बहुत बुरा किया है। समझ में नहीं आता कि ऐसे लोग बेगुनाहों को मार कर आखिर क्या हासिल करना चाहते हैं। दुनिया का कोई भी धर्म बेगुनाहों कि जान लेने से मना करता है। जहाँ तक इस्लाम धर्म का सवाल है तो उसने तो एक व्यक्ति हत्या को पूरी मानवता कि हत्या बतलाया है। फिर तो एक सच्चा मुसलमान इस प्रकार कि गन्दी हरकत कर ही नहीं सकता।
जो लोग इस हमले में शामिल थे उसमें से अकेले अजमल कसाब ही बचा है। जो मर गए उन्हें ऐसा करके आखिर क्या मिला। अजमल कसाब भी किसी तरह बच नहीं सकता। तो फिर उसने ऐसा क्यों क्या। पता नहीं ऐसे लोग आख़िर क्या हासिल करना चाहते हैं। इस तरह कि हरकत जो भी कर रहा है उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता। हर किसी को इस पारकर के हरकतों कि निंदा करनी चाहिए यदि कोई ऐसा नहीं करता है तो उसे बस इतना समझना चाहिए आज इस हमले में किसी का बेटा, किसी का शौहर, और किसी का बाप मारा है कल ऐसा किसी उसके अपने के साथ भी हो सकता है। हम तो बस खुदा से यही दुआ करते हैं कि इस हमले में जो लोग मारे गए हैं खुदा उनके घर वालों को सब्र दे और ऐसा हमला न केवल हिन्दुस्तान में बल्कि दुनिया के किसी भी हिस्से में नहीं हो और इस तरह बेक़सूरों कि जान न जाए।
सोमवार, नवंबर 09, 2009
विधान सभा में राज ठाकरे एंड कंपनी की गुंडा गर्दी
महाराष्ट्र विधान सभा में अबू आसिम आज़मी के शपथ लेने के समय राज ठाकरे उनके निर्वाचित गुंडों ने जो कुछ भी किया उसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है। आए दिन किसी न किसी बात को बहाना बनाकर राज के गुंडे तो पहले भी लोगों के साथ मार पीट करते रहे हैं मगर इस बार तो उनहोंने हद ही कर दी। हिन्दी में शपथ लेकर अबू आसिम आज़मी देशभक्ति का एक बेहतरीन नमूना पेश कर रहे थे मगर राज के गुंडों को देश की भाषा का महत्व ही नहीं मालूम इसलिए उन्हों ने आज़मी के साथ सदन के अन्दर ही बदतमीजी की।
राज और उनके गुंडों की हिम्मत आज इसलिए बढ़ गई है की उन्हों ने पहले जब भी हंगामा किया , बड़े बड़े लोगों के साथ बदतमीजी की तो उन के विरूद्व करवाई नहीं हुई। नॉर्थ इंडिया खास तौर पर बिहार के लोगों के साथ राज के गुंडे आए दिन मार पीट करते रहते हैं मगर कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका। राज और उनके लोग नंगे होकर सड़कों पर नाचते रहे और उन लोगों के ख़िलाफ़ कोई कारवाई नहीं हुई। सरकार और पुलिस की लापरवाही की वजह से ही आज राज के लोगों ने सदन में ही ऐसी हरकत कर दी की सारे देश की आँखें शर्म से झुक गयीं।
फिलहाल सदन में बदतमीजी करने वालों के खिलाफ करवाई हुई है मगर इन के अलावा राज ठाकरे के खिलाफ भी सख्त करवाई होनी चाहिए। ताज्जुब की बात यह है की जिस हरकत को सारा देश बुरा कह रहा है राज और उनके लोग हमेशा वही हरकत करते हैं। अगर राज ठाकरे पर लगाम नही लगाया गया तो आने वाले दिनों में वह और उनके लोग और भी अधिक खतरनाक हो जायेंगे और फिर इस की प्रतिकिर्या में पूरे देश में जो होगा उस पर काबू पाना आसन नहीं होगा।
राज और उनके गुंडों की हिम्मत आज इसलिए बढ़ गई है की उन्हों ने पहले जब भी हंगामा किया , बड़े बड़े लोगों के साथ बदतमीजी की तो उन के विरूद्व करवाई नहीं हुई। नॉर्थ इंडिया खास तौर पर बिहार के लोगों के साथ राज के गुंडे आए दिन मार पीट करते रहते हैं मगर कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका। राज और उनके लोग नंगे होकर सड़कों पर नाचते रहे और उन लोगों के ख़िलाफ़ कोई कारवाई नहीं हुई। सरकार और पुलिस की लापरवाही की वजह से ही आज राज के लोगों ने सदन में ही ऐसी हरकत कर दी की सारे देश की आँखें शर्म से झुक गयीं।
फिलहाल सदन में बदतमीजी करने वालों के खिलाफ करवाई हुई है मगर इन के अलावा राज ठाकरे के खिलाफ भी सख्त करवाई होनी चाहिए। ताज्जुब की बात यह है की जिस हरकत को सारा देश बुरा कह रहा है राज और उनके लोग हमेशा वही हरकत करते हैं। अगर राज ठाकरे पर लगाम नही लगाया गया तो आने वाले दिनों में वह और उनके लोग और भी अधिक खतरनाक हो जायेंगे और फिर इस की प्रतिकिर्या में पूरे देश में जो होगा उस पर काबू पाना आसन नहीं होगा।
शुक्रवार, अक्टूबर 30, 2009
आग बुझा नही पा रहे चलें हैं सुपर पॉवर बनने

भारत और पाकिस्तान के बीच जब भी तनाव पैदा होता है तो टेलिविज़न पर आने वाले रक्षा विशेषज्ञ यही कहते है की हमारे पास पाकिस्तान के मुकाबले बहुत ताक़त है अगर हमारा पाकिस्तान से झगडा हो गया तो उसे पूरी तरह से हमें एक महीना से ज्यादह नही लगेगा। हमारा देश भारत कितना मज़बूत है और भगवान् न करे हम पर कोई बड़ी कठिनाई आती है तो हम इस से निबटने के लिए कितने सक्षम हैं इसका अंदाजा हमें जयपुर के पास इंडियन आयल के डिपो में लगी खतरनाक आग के बाद हो गया जिसे कई घंटे बीतने के बाद भी बुझाया नही जा सका। अब प्रश्न यह उठता है की सुपर पॉवर बनने का खवाब देखने वाले हिंदुस्तान के पास ऐसा कोई सिस्टम नहीं है जिसकी सहायता से ऐसी आग पर काबू पाया जा सके।
दिल्ली , मुंबई, और मथुरा से माहिर बुलाये गए मगर सब के सब इस आग को बुझाने में लाचार साबित हुए। पेट्रोलियम मिनिस्टर , जयपुर के चीफ फाएर ऑफिसर और मथुरा के जो भी माहिर गए सब ने अपने हाथ खड़े कर दिए और यही कहा की इस आग पर काबू पाना हमारे बस का नहीं है। हम तो उस समय का इंतजार कर रहे हैं जब टैंक का पेट्रोल ख़ुद समाप्त हो जाएगा और फिर आग ख़त्म हो जायेगी। डिपो में लगी इस आग से लगभग २० लोग मारे गए , अरबों रूपये का नुकसान हुआ और हजारों लोगों को अपना घर बार छोड़ कर भागना पड़ा। मगर यह सब उतना अफसोसनाक नहीं है जितना अफ़सोसनाक यह है की हमारे पास ऐसे सिस्टम की कमी है जो इस तरह की मुसीबत आने पर इसका हल निकाल सके।
सच्चाई यह है की हमारे देश में किसी को अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास नहीं है। जयपुर में सिस्टम की खामी देखिये की जब मथुरा से गए सी आई एस ऍफ़ के लोग एक ख़ास केमिकल ले कर वहां पहुंचे तो उन्हें अपनी करवाई शुरू करने में इस लिए देर लगी क्योंकि उन्हें इस के लिए पानी की आवशयकता थी मगर उन्हें चार पाँच घंटे तक पानी नहीं मिला। वैसे बाद में इस टीम ने भी कह दिया की इस खतरनाक आग पर काबू पाना उनके बस का नहीं है। अब यह बात संजीदगी से सोचने की है की क्या इस नाकामी के बाद हम यह कहने की पोजीशन में हैं की हम ने काफ़ी तरक्की कर ली है और हम कई मुल्कों से टक्कर लेने की पोजीशन में हैं और यह की जल्द ही हम भी सुपर पॉवर बन जायेंगे। जहाँ तक मेरी समझ है जो देश ऐसी आग को बुझाने की सलाहियत नहीं रखता हो उसे ख़ुद को विकास शील देश कहने का हक भी नही है।
दिल्ली , मुंबई, और मथुरा से माहिर बुलाये गए मगर सब के सब इस आग को बुझाने में लाचार साबित हुए। पेट्रोलियम मिनिस्टर , जयपुर के चीफ फाएर ऑफिसर और मथुरा के जो भी माहिर गए सब ने अपने हाथ खड़े कर दिए और यही कहा की इस आग पर काबू पाना हमारे बस का नहीं है। हम तो उस समय का इंतजार कर रहे हैं जब टैंक का पेट्रोल ख़ुद समाप्त हो जाएगा और फिर आग ख़त्म हो जायेगी। डिपो में लगी इस आग से लगभग २० लोग मारे गए , अरबों रूपये का नुकसान हुआ और हजारों लोगों को अपना घर बार छोड़ कर भागना पड़ा। मगर यह सब उतना अफसोसनाक नहीं है जितना अफ़सोसनाक यह है की हमारे पास ऐसे सिस्टम की कमी है जो इस तरह की मुसीबत आने पर इसका हल निकाल सके।
सच्चाई यह है की हमारे देश में किसी को अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास नहीं है। जयपुर में सिस्टम की खामी देखिये की जब मथुरा से गए सी आई एस ऍफ़ के लोग एक ख़ास केमिकल ले कर वहां पहुंचे तो उन्हें अपनी करवाई शुरू करने में इस लिए देर लगी क्योंकि उन्हें इस के लिए पानी की आवशयकता थी मगर उन्हें चार पाँच घंटे तक पानी नहीं मिला। वैसे बाद में इस टीम ने भी कह दिया की इस खतरनाक आग पर काबू पाना उनके बस का नहीं है। अब यह बात संजीदगी से सोचने की है की क्या इस नाकामी के बाद हम यह कहने की पोजीशन में हैं की हम ने काफ़ी तरक्की कर ली है और हम कई मुल्कों से टक्कर लेने की पोजीशन में हैं और यह की जल्द ही हम भी सुपर पॉवर बन जायेंगे। जहाँ तक मेरी समझ है जो देश ऐसी आग को बुझाने की सलाहियत नहीं रखता हो उसे ख़ुद को विकास शील देश कहने का हक भी नही है।
गुरुवार, अक्टूबर 22, 2009
कमाल खान का कमाल

अब तक जो खबरें आ रही हैं उसके मुताबिक अंततः देशद्रोही से मश्हूर हुए कमाल खान को गाली बोलने और घर वालों के साथ मारपीट करने पर बिग बॉस ने अपने घर से निकाल दिया। यह तो पहले दिन ही तै हो गया था की बिग बॉस के घर में रहने वाले बाकी लोग कमाल को पसंद नहीं करते हैं। मगर सच्चाई यह है की चैनल वाले और वह सब लोग जो इस प्रोग्राम को देखते हैं वह सब कमाल को ही पसंद करते थे और उनकी वजह से ही लोग मज़े भी ले रहे थे और चैनल की टी आर पी बढ़ गई थी।
यह सही है की कमाल ने कुछ ज्यादह ही बदतमीजी कर दी मगर सच्चाई यह है की इस तरह के प्रोग्राम में ऐसा ही होना चाहिए और यही हर कोई चाहता है। यदि कमाल की बात को छोड़ दें तो कौन सा मेहमान उस घर का शरीफ है। हर कोई एक दूसरे को गली दे रहा है और हर कोई एक दूसरे की बुरे कर रहा है। औरतों जैसी हरकत करने वाले रोहित वर्मा भी बिल्कुल औरतों की तरह ही जब देखो किसी न किसी की बुराई कर रहे हैं। अब जबकि कमाल खान इस घर से निकाले जा चुके है तो क्या अब वहां हंगामा नही होगा । और अगर हंगामा नहीं होगा तो फिर कौन इतना बेवकूफ है जो एक शराफत वाले प्रोग्राम को अपना कीमती वक्त ख़राब का के देखेगा ।
सही बात यह है की इस तरह के प्रोग्राम का आना ही ग़लत है। अंत में जीत जिसकी भी हो मगर इस दौरान कई लोगों में झगडा तो हो ही जाता है। घर में कमाल के बारे सब जैसी बातें कर रहे थे उस से तो यही लगता है की उन में से बिन्दु को छोड़ कर अब किसी से भी उसके रिश्ते बेहतर नही हो सकते। दुनिया भर में लोगों को हंसाने वाले राजू श्रीवास्तव जैसा शरीफ व्यक्ति भी कमाल से झगड़ गया और सब ने देखा की कमाल ने ज्यादह बदतमीजी की मगर गाली राजू ने भी दी। क्या अब कभी राजू और कमाल के रिश्ते बेहतर हो सकते हैं। मेरे हिसाब से तो ऐसा कभी नहीं हो सकता ।
कुल मिलाकर अगर आप भारत में ऐसा प्रोग्राम देखना चाहते है तो आप को बिग बॉस के घर में गली गलोज देखने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। बल्कि जनता तो गली गलोज ही देखना चाहती है और अगर ऐसा नहीं है तो फिर देख लेंगे की बिना मर पीट और गली गलोज के यह प्रोग्राम कैसे सफल होता है। कई लोगों ने कहा है की कमाल जो कर रहे थे वह ज्यादह हो गया मगर ऐसी हरकतें ही इस तरह के प्रोग्रामों को सफल बनाती हैं।
मंगलवार, अक्टूबर 20, 2009
सिब्बल साहब का यह फ़ैसला उचित नहीं
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने आई आई टी में कई तब्दीलियाँ करने की तरफ़ इशारा दिया है। उनकी कौन सी बात मणि जायेगी और कौन सी नहीं यह तो अलग सवाल है मगर उनका यह सुझाव किसी भी तरह से मानने के काबिल नहीं है की आई आई टी की प्रवेश परीक्षा में वही छात्र बैठ सकते हैं जिन्हों ने बारहवीं में ८० प्रतिशत नम्बर हासिल किए हों। इतने ज्यादह नम्बर सी बी एस ई के लड़के ही लाते हैं और दूसरे बोर्ड में इतने अधिक नम्बर लाना आसन नहीं है। वैसे तो इस फैसले को लागू नहीं होना चाहिए मगर अगर ऐसा हो जाता है तो सबसे ज्यादह नुकसान बिहार के स्टुडेंट का होगा। मैं ऐसे एक दो नही बल्कि कई स्टुडेंट को जानता हूँ जिन्हों ने मेट्रिक या बारहवीं में कोई बहुत अच्छा नहीं किया है मगर बाद में मेहनत करके वोह आई आई टी में सफल हुए। इसका मतलब यह हुआ की यह कोई ज़रूरी नही है की कोई लड़का यदि शुरू के दिनों में बेहतर नही है तो वोह बाद में भी अच्छा नही करेगा। सिबाल साहब अपने इस सुझाव को वापस ले लें तो बेहतर कोगा।
शनिवार, अक्टूबर 10, 2009
ओबामा को नोबेल

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को शान्ति का नोबेल पुरस्कार देने का इलान किया गया है। दुनिया के और दूसरे पुरस्कारों की तरह अब नोबेल के बारे में भी ऐसा कहा जाने लगा है की अब इस पुरस्कार की भी कोई बहुत ज्यादह अहमियत नही रह गई है। ओबामा ही नही इस से पहले भी नोबेल इनाम खास तौर पर शान्ति का नोबेल ऐसे कई लोगों को मिल चुका है जिन्हों ने दुनिया में शान्ति फैलाने के बजाये फसाद फैलाया। जहाँ तक ओबामा का सवाल है तो सिर्फ़ अल काएदा या सिर्फ़ तालिबान वाले ही ओबामा को पुरस्कार देने को ग़लत नहीं मान रहे हैं बल्कि दुनिया में लाखों ऐसे लोग है हैं जिनकी नज़र में ओबाम अफगानिस्तान या फिर इराक में जो कर रहे हैं वोह सही नही है। दुनिया में अमेरिका की वजह से शान्ति है या फसाद इस से हर कोई अवगत है । ऐसा नही है की तालिबान या अल काएदा के लोग जो कर रहे हैं वोह सही है मगर ओबामा और उनके लोग जो कर रहें हैं वोह भी सही नही है। ओबामा ने अब तक जो किया है उसे देख कर ऐसा नही लगता की वोह इस इनाम के हकदार थे।
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