गुरुवार, जून 02, 2011

पाकिस्तानी क्रिकेट में हलचल


पाकिस्तानी क्रिकेट में कब किया हो जाये कहा नहीं जा सकता। कल तक जिस शहीद आफरीदी की टीम में तूती बोलती थी उस के लिए हालात ऐसे बन गए की उसे समय से पहले अंतर्राष्ट्रीए क्रिकेट को अलविदा कहना पड़ा। जी हाँ वही शाहिद आफरीदी जिन्हें कभी गेंदबाजों की धुनाई के लिए जाना जाता था उनकी अब टीम में ऐसी हैसियत हो गयी की उन्हें क्रिकेट को समय से काफी पहले अलविदा कह देना पड़ा। कहा यह जा रहा है बल्कि सच्चाई भी यही है की अफरीदी ने यह कदम इसलिए उठाया की वो बोर्ड दुयारा पाकिस्तान की एक दिवसीय टीम की कप्तानी से हटाए जाने से नाराज थे। पाकिस्तानी क्रिकेट का इतिहास बताता है की यहाँ खिलाड़ियों में न तो कभी आपस में बनी और न ही कभी खिलाड़ी बोर्ड से खुश रहे। इमरान खान और जावेद मियानदाद पाकिस्तानी क्रिकेट की तारीख के दो बड़े स्टार रहे हैं मगर इन दोनों में कभी नहीं बनी। जहां तक बोर्ड का सवाल है तो कोई खिलाड़ी अगर खुश रहा तो बोर्ड से नाराज़ खिलाड़ियों की कमी भी नहीं रही। कुछ खिलाड़ी खुद को बोर्ड से बड़ा भी मानते रहे। इस बार भी कुछ ऐसा ही लग रहा है। आफरीदी के बयान से भी ऐसा ही लग रहा है की वो न सिर्फ बोर्ड की हरकत से नाराज़ हैं बल्कि चाहते हैं की बोर्ड अपनी गलती पर शरिन्दा हो। तभी तो उनहों ने जोर देकर कहा वह तभी वापसी करेंगे जब पीसीबी के 'निम्नस्तरीय' प्रशासक इस्तीफा देंगे।
आफ़र्दी की वापसी होती है या नहीं इसका फैसला हो सकता है की जब आप यह पंक्ति पढ़ रहे हो तो हो जाये मगर उनहों ने सन्यास की घोषणा के समय जो कहा वो यह है 'लोगों ने मुझे काफी सम्मान और प्यार दिया है और मैं इस बोर्ड के साथ काम करके इसे बर्बाद नहीं करना चाहता जिसे यह भी नहीं पता कि खिलाड़ियों का सम्मान कैसे करते हैं।' पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड पर निशाना साधते हुए 31 वर्षीय अफरीदी ने प्रशासकों के मौजूदा समूह को 'निम्नस्तरीय लोग' बताया। इस अनुभवी आलराउंडर ने कहा कि जब तक एजाज बट की अध्यक्षता वाला मौजूदा बोर्ड बरकरार रहेगा तब तक वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट नहीं खेलेंगे। उन्होंने कहा, 'मैं यह साफ करना चाहता हूं कि जब तक मौजूदा बोर्ड रहेगा तब तक मैं अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट नहीं खेलूंगा। जब ये अधिकारी चले जाएंगे और अगर लोग चाहेंगे कि मैं खेलूं तो मैं वापसी पर विचार कर सकता हूं।'
असल में सारी कहानी यह है की आफरीदी इस बात से नाराज़ थे की उन्हें किसी खास कारण के कप्तानी से हटा दिया गया। उनहों ने कहा इस बोर्ड में मेरी कोई कदर नहीं है जिसने मुझे कप्तान के रूप में बर्खास्त करने का ना तो कोई कारण बताया और ना ही मेरा पक्ष सुनने की कोशिश की। मुझे नहीं पता कि उन्होंने किस आधार पर मुझे कप्तानी से बर्खास्त किया। मैंने बिखरी हुई टीम को संवारने में कड़ी मेहनत की और इसे जुझारू टीम में बदला। हम विश्व कप सेमीफाइनल में खेले और इसके बावजूद उन्होंने मेरा पक्ष सुने बिना मुझे बर्खास्त कर दिया।'
मालूम हो की बोर्ड ने वेस्टइंडीज के खिलाफ एक दिवसीय सीरीज में पाकिस्तान की 3-2 की जीत के बावजूद अफरीदी को कप्तान के पद से हटा दिया था। बोर्ड ने उन्हें हटाने का कोई आधिकारिक कारण तो नहीं बताया लेकिन माना जा रहा है कि यह अफरीदी के कोच वकार यूनुस के साथ चयन मुद्दों पर बढ़ते मतभेद का नतीजा था। अफरीदी ने दावा किया कि लाहौर के पंजाब प्रांत का एक समूह है जो हमेशा उनके खिलाफ रहता है। उन्होंने कहा,'यह समूह हमेशा मेरे खिलाफ काम करता है। ये मेरे खिलाफ अध्यक्ष के कान भरते रहते हैं। शायद वे नहीं चाहते कि मैं खेलूं क्योंकि मैं उनकी योजना के आड़े आता हूं।' आफरीदी ने यह भी आरोप लगाया कि कप्तान के रूप में टीमों के चयन के दौरान कभी उनसे सलाह मशविरा नहीं किया जाता। इसके अलावा सीरीज से पहले अंतिम वक्त तक उन्हें सुनिश्चित नहीं होता कि वह कप्तान होंगे।
आइयरलैंड के खिलाफ मैच के लिए कप्तानी से हटाए जाने के बाद अफरीदी टीम से भी हट गए। उन्होंने बोर्ड से कहा कि वह अपने बीमार पिता के साथ समय बिताना चाहते हैं जो अमेरिका में उपचार करा रहे हैं। लेकिन वह अमेरिका से इंग्लैंड पहुंच गए और लंदन से अपने संन्यास लेने की घोषणा की। आफरीदी खुद जो कहें मगर क्रिकेट के जानकार अफरीदी की इस हरकत को उचित नहीं मानते। उनके अनुसार बोर्ड को यह हक़ हासिल है की वो किसे कप्तान बनाए और किसे नहीं आपका काम सिर्फ खेलना है और आपको हर हाल में देश के लिए खेलने को तैयार रहना चाहिए।
इस सिलसिले में पूर्व पाकिस्तानी कप्तान जहीर अब्बास ने कहा, 'मुझे समझ में नहीं आ रहा कि उसे ऐसा करने की क्या जरूरत थी। आज वह बोर्ड को कसूरवार ठहरा रहा है लेकिन वह भूल गया कि आस्ट्रेलिया में गेंद से छेड़छाड़ के विवाद के समय इसी बोर्ड ने उसका साथ दिया था जबकि वह फार्म में भी नहीं था।' उन्होंने कहा, 'टीम जब विश्व कप सेमीफाइनल में पहुंची तो बोर्ड ने उसे पुरस्कार के साथ काफी सम्मान भी दिया।' अब्बास ने कहा कि यदि उसे टीम प्रबंधन से समस्या थी तो उसे बोर्ड अध्यक्ष एजाज बट के सभी पक्षों से मिलकर समस्या का समाधान तलाशने तक इंतजार करना चाहिए था।
पूर्व टेस्ट लेग स्पिनर और पूर्व मुख्य चयनकर्ता अब्दुल कादिर ने भी अफरीदी की संन्यास शब्द का मखौल बनाने के लिए आलोचना की। उन्होंने कहा, 'आजकल संन्यास का ऐलान करना मजाक बन गया है। हमारे खिलाड़ी नियमित तौर पर ऐसा कर रहे हैं जिससे पाकिस्तान क्रिकेट को नुकसान हो रहा है।' पूर्व टेस्ट स्पिनर इकबाल कासिम ने कहा कि अफरीदी के फैसले से पाकिस्तान क्रिकेट को नुकसान ही होगा। वैसे कई ऐसे भी हैं जो आफरीदी के फैसले को उचित ठहराते हैं। ऐसे लोगों का कहना है की जिस कप्तान ने टीम को विश्व कप के सेमी फ़ाइनल में पहुंचाया उसके साथ बोर्ड को ऐसा सुलूक नहीं करना चाहिए।
आफरीदी का यह फैसला उचित है या नहीं इसपर बहस आगे भी चलती रहेगी मगर इतना तो तय है की आफरीदी की गिनती पाकिस्तान के अच्छे क्रिकेटरों में होती थी। हाल ही में आफरीदी की कप्तानी में ही पाकिस्तानी टीम विश्व कप के सेमी फ़ाइनल तक पहुंची। एकदिवसीए क्रिकेट में आफरीदी ने तेज़ बल्लेबाज़ी का एक शानदार नमूना पेश किया। अपने दूसरे ही मैच में उनहों ने सिर्फ 37 गेंदों पर ही शतक ठोंक दिये। यह एकदिवसीए क्रिकेट का आज भी सबसे तेज़ शतक है। शुरू में अपनी तेज़ बल्लेबाज़ी के लिए मशहूर हुये अफरीदी बाद में बेहतर गेंदबाजी भी करने लगे। उन्होंने कुल मिलकर 325 एक दिवसीय मैचों में भाग लिए हैं जिन में 23.49 की औसत से उनहों ने 6,695 रन बनाए हैं । उनका स्ट्राइक रेट 113.82 रहा। एक गेंदबाज के तौर पर उन्होंने 34.22 की औसत से 315 विकेट भी प्राप्त किए। अफरीदी ने 43 ट्वंटी-20 मैच भी खेले हैं जिनमें उनहों ने 683 रन बनाने के अलावा 53 विकेट हासिल किए हैं। अफरीदी को 27 टेस्ट मैच भी खेलने का मौका मिला जिनमें उनहों ने 1,716 रन बनाए और एक गेंबाज़ के तौर पर 48 विकेट हासिल किए। आफरीदी की वापसी होगी या नहीं यह तो पता चल ही जाएगा, अगर उनकी वापसी नहीं होती है तो उनकी तेज़ बल्लेबाज़ी और किसी को आउट करने के बाद उनके खुश होने का एक खास अंदाज़ हमेशा उनकी याद दिलती रहेगी।

मंगलवार, मार्च 01, 2011

और भी गम हैं जमाने में क्रिकेट के सिवा

वैसे तो क्रिकेट के दसवें विश्व कप का आग़ाज़ 19 फरवरी को भारत और बांग्लादेश के बीच खेले गए मैच से हुआ, मगर इस के कुछ दिन पहले से ही भारत पूरी तरह से इस के रंग में रंग गया है। विश्व कप शुरू होने के लगभग एक सप्ताह पहले से ही क्रिकेट की खबरें तो खूब आ ही रही थीं, अब जबसे विश्व कप शुरू हुआ है ऐसा लगता है क्रिकेट के अलावा इस देश में कुछ हो ही नहीं रहा है। समझ में नहीं आता यह क्रिकेट का बुखार है या फिर जनता की बेबसी, जो कई बड़े मुद्दों को छोडकर पूरी तरह से क्रिकेट के पीछे लगी हुई है। जिसे देखो वो सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट की बात कर रहा है। जब से विश्व कप की गहमा गहमी शुरू हुई है तब से भारत समेत विश्व के दूसरे देशों में भी कई बड़ी खबरें सामने आयीं हैं, मगर उन खबरों को वैसा महत्व नहीं दिया जा रहा है जैसा क्रिकेट को दिया जा रहा है।


टू जी स्पेक्‍ट्रम घोटाले में प्रधानमंत्री ने खुद को हर ओर से घिरता देख इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों के साथ प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया। संसद का कामकाज ठीक से चले इसके लिए कोशिशें होती रहीं। कई मुस्लिम देशों में बड़ा संघर्ष देखने को मिला। मगर यह सब खबरें क्रिकेट से पीछे दब गईं। हद तो यह हो गई कि पत्रकारों ने प्रधानमंत्री के साथ एक संजीदा इशू पर हुई कांफ्रेंस में क्रिकेट से संबंधित सवाल पूछ लिया। समाचार-पत्रों में और टेलीविज़न पर इन दिनों घट रही बड़ी खबरों को उतनी जगह नहीं मिली जितनी मिलनी चाहिए। कारण यह कि अब हर किसी को क्रिकेट पसंद है, क्रिकेट पसंद नहीं भी है तो जबरदस्ती आपको क्रिकेट को पसंद करना पड़ेगा। क्‍योंकि यदि आप टेलीविज़न देखने के शौकीन हैं तो आपको तो क्रिकेट के अतिरिक्त वहाँ कोई खबर मिलेगी ही नहीं तो फिर देखेंगे क्‍या। मजबूरी में आपको भी क्रिकेट को पसंद करना पड़ेगा।

मार्केट के बड़े-बड़े खिलाड़ियों की एक साजिश के तहत अब क्रिकेट ने हर किसी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर विश्व कप के दौरान झारखंड में राष्‍ट्रीय गान भी हो रहे थे, उसके बारे में तो किसी को पता ही नहीं चला। इस गेम के दौरान कई नए रिकार्ड बन गए मगर आम पाठक को इसका अंजदाजा हुआ भी नहीं। होता भी कैसे अखबार में तो हर तरफ क्रिकेट की ही धूम थी और है। पहले कहा जा रहा था कि क्रिकेट को इतना महत्व दिया जा रहा है कि दूसरे खेल बिल्कुल दब गए हैं। मगर अब सिर्फ खेल नहीं दब गए हैं बल्कि कई बड़े समाचार भी दब गए हैं। दूसरे खेलों में बड़ा-बड़ा कमाल करने वाला खिलाड़ी अपनी पहचान नहीं बना पाता, मगर क्रिकेट में बारहवाँ खिलाड़ी भी हर किसी की नज़र में आ जाता है।

अब सवाल यह है कि यह कमाल क्रिकेट का है या फिर उन लोगों का, जो अपने अपने लाभ के लिए क्रिकेट को इतना महत्व दे रहे हैं। क्रिकेट दिन भर का खेल है जबकि फुटबाल का फैसला सिर्फ 90 मिनट में हो जाता है। फुटबाल में आप ने एक पल के लिए आँख फेरी तो पता नहीं कौन सा शानदार पल आपने मिस कर दिया, जबकि क्रिकेट में दिन भर फंसे रहना पड़ता है। बल्लेबाज़ी और गेंदबाजी करने वाले खिलाड़ी के अलावा बाक़ी खिलाड़ी उल्लू की तरह मुंह ताकते रहते हैं, उसके बावजूद भारत जैसे देश में क्रिकेट ने अब एक बहुत बड़े त्‍योहार का रूप धरण कर लिया है। यही कारण है कि विश्‍व कप आते ही सरकारी अफसरों ने छुट्टियाँ ले ली हैं, विद्यार्थियों ने बहाने बना कर स्कूल जाना छोड़ दिया है। बड़े-बड़े होटलों ने खिलाड़ियों के नाम पर डिश तैयार कर ली है। कुछ लड़कियां अपने चेहरों पर विश्व कप का लोगो बनवा रही है तो किसी ने लोगो के लिए अपनी पूरी पीठ ही दे दी है। अखबारों ने पृष्ठों की संख्या बढ़ा ही दी है, चैनल वालों ने तो एक अजब सा ड्रामा ही शुरू कर दिया है। टॉस जीतने से लेकर वो अब हर गेंद और हर विकेट को ब्रेकिंग न्यूज़ के तौर पर पेश कर रहे हैं। किसी किसी चैनल पर पूर्व खिलाड़ी अपनी राय दे रहें हैं तो कहीं कहीं बाबा रामदेव के हमशक्ल से नौटंकी कराई जा रही है।

क्रिकेट कोई नया खेल नहीं है। इस की शुरुआत 1876 में हुई थी। फिर 1971 में पहली बार एकदिवसीय अंतराष्‍ट्रीय मुकाबला हुआ। धीरे-धीरे वन डे मैचों में रंगीन कपड़ों का इस्तेमाल हुआ। एक दिन ऐसा आया जब क्रिकेट 20-20 ओवरों की होने लगी और आईपीएल जैसे मुकाबले भी होने लगे जिनमें खेल तो हुआ ही पैसों की बरसात भी हुई और जम कर अय्याशी भी हुई। अय्याशी का यह आलम था कि स्टेडियम में शराब भी परोसी गयी। सच्चाई यह है कि अब क्रिकेट को पूरी तरह से मार्केट से जोड़ दिया गया है। पहले खिलाड़ी शायद देश के लिए खेलते थे, उनमें यह जज़्बा होता था कि देश के लिए खेलूँगा तो खुद का और माँ-बाप का नाम रोशन होगा, मगर अब ऐसा नहीं है खिलाड़ी पैसे के लिए खेल रहे हैं। क्रिकेट में अब दौलत भी मिल रही है और शोहरत भी मिल रही है। खिलाड़ी की बस अब एक ही इच्छा है किसी तरह देश के लिए दो-चार महीने खेल लो। किसी तरह से 6 महीना भी खेलने में सफल रहे तो मैच फीस के तौर पर मोटी रकम तो मिलेगी ही बड़ी-बड़ी कंपनियों के विज्ञापन भी मिल जाएंगे और फिर टीवी पर बकवास कर के कमाई हो ही जाएगी। क्रिकेट को अब पूरी तरह से ग्‍लैमर से जोड़ दिया गया है।

एक तरफ जहां क्रिकेट में भी नाच गाने होने लगे हैं, वहीं अब क्रिकेटर भी नाचने गाने लगा है। क्रिकेट में आने के बाद आदमी कितना बहक सकता है, इसका अंदाज़ा आप इरफान पठान और युसूफ पठान जैसे मौलाना के बेटे को देख कर लगा सकते हैं, जो क्रिकेट में आने से पहले बड़े भोले थे, मगर अब फिल्मी हीरोइनों के साथ नाचते हुये नज़र आ जाते हैं। असल में यह सारी चीज़ें मार्केटिंग एजेंसियां तय करती हैं। कुल मिलाकर देखें तो यह सही है कि जनता का कीमती समय तो बर्बाद हो रहा है, मगर इसके अलावा क्रिकेट से हर किसी का फायदा ही हो रहा है। खिलाड़ी भी कमा रहे हैं, क्रिकेट बोर्ड भी कमा रहा है, कंपनियां भी कमा रही हैं, चैनल भी कमा रहे हैं, जो विज्ञापन दे रहा है वो भी कमा रहा है और जिन खिलाड़ियों ने अपने करियर के दौरान नहीं कमाया वो अब चैनलों पर मेहमान बन कर कमा रहे हैं। हर न्यूज़ चैनल अपनी अपनी हैसियत के हिसाब से मेहमान बुला रहा है।

क्रिकेट ने अगर बड़ी तरक़्क़ी कर ली है और इससे किसी को लाभ हो रहा है तो अच्छी बात है, मगर क्‍या इस समय देश में क्रिकेट के अलावा और कुछ नहीं हो रहा है या फिर यह कि इन दिनों क्‍या क्रिकेट ही सबसे बड़ी खबर है। लीबिया से 40 साल बाद गद्दाफ़ी की कुर्सी हिलती हुई नज़र आ रही है, यमन, बहरीन और दूसरे मुस्लिम देशों में इन दिनों आग लगी हुई है। खुद अपने देश भारत में इन दिनों कई ऐसे मुद्दे हैं, जिनको सुर्खियों में होना चाहिए मगर अफसोस की ऐसा नहीं हो रहा है। समाचार पत्र या फिर चैनल जनता की सोच तय करते हैं। वो जैसा प्रकाशित करेंगे या दिखाएँगे वही जनता देखेगी और समझेगी इसलिए समाचार पत्र और चैनल को भी चाहिए कि वो क्रिकेट की खबरें ज़रूर दें, मगर क्रिकेट से दीवानगी के चक्कर में बड़ी खबरों को न छोड़ें। उन्हें समझना चाहिए कि और भी ग़म हैं जमाने में क्रिकेट के सिवा.

सोमवार, जनवरी 31, 2011

मोदी तो एक बहाना है असली मक़सद देवबंद पर कब्जा जमाना है


नए कुलपति को हटाने के लिए पर्दे के पीछे से खेल जारी
वसतानवी के खिलाफ खबर नहीं छापने के लिए उर्दू के अखबार ने लाख रुपए मांगे
देवबंद में उर्दू अखबार सहाफ़त की कापियाँ जलाईं गईं
भारत की सब से बड़ी और विश्व की कुछ बड़ी इस्लामी शिक्षण संस्थाओं में शामिल दारुल उलूम देवबंद की खबरें हिन्दी और अंग्रेज़ी मीडिया में आम तौर पर नहीं के बराबर छपती हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है की इस संस्था में हिन्दी और अंग्रेज़ी के अखबार जाते ही नहीं । यहाँ की खबरें तभी प्रकाशित होती हैं जब चुनाव के समय मुस्लिम वोट हासिल करने के लिए कोई नेता इस संस्था का दौरा करता है या फिर जब यहाँ से कोई फतवा जारी होता है। इन दिनों दारूल उलूम एक बार फिर फिर सुर्खियों में है। यह सही है की उर्दू के अखबारों की तरह दारुल उलूम की खबरें अंग्रेज़ी या हिन्दी के अखबारों में ज्यादा नहीं छप रहीं हैं मगर इस बार छप ज़रूर रहीं हैं। इसकी एक बड़ी वजह है इस संस्था के नए वी सी मौलाना ग़ुलाम वसतानवी के मुंह से गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ। मगर हिन्दी और अंग्रेज़ी के अखबारों में एक जैसी ही खबर आ रही है की चूंकि नए वी सी ने गुजरात के मुख्य मंत्री मोदी की तारीफ की इस लिए उनको हटाने की मांग हो रही है। मगर सही खबर कुछ और ही है। दारुल उलूम में इन दिनों बवाल मचा हुआ है, पढ़ाई लिखाई ठप्प है और वहाँ का माहौल तो गरम है ही हर वो वायक्ति चिंता में है जिसे मुसलमानों के इस सबसे बड़े मदरसे में दिलचस्पी है। मौलाना वसतनवी के पीछे आखिर लोग कियून पड़े हुये हैं, आखिर वो कौन लोग हैं जो उनके पीछे लगे हैं, वास्तवि ने पहले परेशान हो कर इस्तीफा दे दिया अब वो कियूं कह रहें है मेरा निर्णय अंतिम नहीं है और मुझे रखने या नहीं रखने का फैसला गोवार्निंग काउंसिल को करना है। यह सब आखिर हो कियूं हो रहा हैं और वो कौन कौन से मौलाना हैं जो इस गंदे खेल में शामिल हैं आइये आपको बताते हैं।
पिछले दिनों जनाब मर्गूबुर्रहमान रहमान की मौत के बाद गुजरात के मौलाना ग़ुलाम मोहम्मद वसतानवी को यहाँ का मोहतमीम यानि कुलपति बनाया गया। उनके कुलपति बनते ही देवबंद में जो बवाल शुरू हुआ है वो धीरे धीरे उग्र रूप लेता जा रहा है और वासतानवी के इस्तीफे की पेशकश के बाद भी कम नहीं हुआ है। वसतानवी का विरोध कई कारणों से हो रहा है। पहला उन पर यह इल्ज़ाम है की वो चूंकि बड़े अमीर मौलाना हैं इस लिए उनहों ने अपने पक्ष में वोट खरीद लिया और इस बड़े ओहदे पर क़ाबिज़ हो गए। उनके विरोध की दूसरी बड़ी वजह है उनका अखबारों में प्रकाशित वो बयान जिसमें उनहों ने गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की। उनके विरोध की तीसरी और सबसे बड़ी वजह यह है की उनकी एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसमें गुजरात में एक प्रोग्राम के दौरान वो किसी को एक मूर्ति भेंट कर रहें हैं। सामान्य तौर पर आम मुसलमानों को मौलाना वसतनवी के विरोध की यही तीन कारण समझ में आ रहे हें।
अब बात करते हैं पहले कारण की। वसतानवी पर आरोप है की उनहों ने पैसे के बल पर यह पद हासिल किया है। जो लोग ऐसा आरोप लगा रहें हैं उन्हें यह समझना चाहिए की यह संभव नहीं है। मजलिसे शुरा यानि गवार्निंग काउंसिल में देश के बड़े बड़े मौलाना शामिल हैं। उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती की वो पैसा लेकर वोट करेंगे। और अगर ऐसा है भी तो फिर ऐसे लोगों को गवार्निंग काउंसिल में कियूं रखा गया है। विरोध की दूसरी वजह हजारों मुसलमानों के हत्यारे नरेनरा मोदी की तारीफ है। जहां तक नरेंद्र मोदी का सवाल है सिर्फ मुसलमान ही नहीं दूसरे धर्म के लोग भी यह समझते हैं की गुजरात दंगे में मोदी का भी रोल रहा है। कोई भी सच्चा मुसलमान जिसे अपनी क़ौम से और मानवता से मोहब्बत होगी वो मोदी भला कैसे माफ कर देगा। हर किसी को पता है की गुजरात दंगे में पूरी कमान मोदी के हाथ में थी यह सब उन्हें पता था की राज्य में मुसलमानों को कत्ल किया जा रहा है। महिलाओं की इज्ज़त लूटी जा रही है और बच्चों को अनाथ किया जा रहा है। इस लिए यह सब जानते हुये कोई भी अच्छा आदमी मोदी की तारीफ नहीं कर सकता। जहां तक राज्य में मोदी के कामों का सवाल है तो इस से किसी को इंकार नहीं हो सकता की विकास के जो काम मोदी ने किए हैं वो कोई दूसरा मुख्यमंत्री नहीं कर सका।
रहा सवाल किसी को मूर्ति भेंट करने का तो चूंकि मौलाना वसतानवी गुजरात के हैं और वहाँ वो कई प्रकार के बीजनेस्स में शामिल हैं इसलिए किसी प्रोग्राम में उनहों ने किसी को मूर्ति भेंट की होगी। यह इस्लाम के हिसाब से गलत है इस लिए उन्हें इस सिलसिले में माफी मांग लेनी चाहिए। देवबंद के पूराने छात्र और देवबंद को अच्छी तरह से समझने वाले बताते हैं की वसतानवी के विरोध की असली वजह यह तीन बिन्दु नहीं हैं। सच्चाई यह है की चूंकि दारुल उलूम भारत का सब से बड़ा इस्लामी इदारा है। यहाँ से जारी बयान का असर न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के दूसरे मुल्कों के मुसलमानों पर भी होता है इस लिए कुछ खास लोग ऐसे हैं जो हमेशा इस बड़ी संस्था पर अपना कब्जा बनाए रखना चाहते हैं। अब चूंकि वसतानवी का इस पर कब्जा हो गया है इस लिए उन के खिलाफ तरह तरह के बयान जारी किए जा रहें। संस्था में पढ़ाई लिखाई के माहौल को ठप्प अकर्के वसतानवी को देवबंद से भागने के लिए मजबूर किया गया। फिलहाल वसतनवी ने इस्तीफे की पेशकश तो कर दी है मगर उन्हें पूरे भारत से और खास तौर पर गुजरात से जो समर्थन मिल रहा है उसके बाद उनहों ने अपना फैसला बदल लिया है। देवबंद के साथ साथ पूरे देश के मुसलमान जिन्हें इस संथा से लगाव है आज दो गरोहों में बाँट गए हैं। एक वो हैं जो वसतानवी के साथ है और एक वो हैं जो उनका विरोध कर रहें हैं। अलबत्ता कुछ विरोध करने वाले ऐसे हैं जो यह नहीं कह रहे की उनको पद छोड़ देना चाहिए मगर उनका यह कहना सही है की मोदी की तारीफ और मूर्ति भेंट करने वाली बात उचित नहीं है इस के लिए उन्हें मुसलमानों से माफी मांगनी चाहिए। बाक़ी जो दूसरे विरोध करने वाले हैं उनके साथ एक बड़ी समस्या यह है की वो वसतानवी का विरोध तो कर रहें हैं मगर खुल कर सामने नहीं आ रहें हैं। विरोध करने वाले तो इस हद तक गिर गए हैं की उनहों ने उर्दू के एक अखबार को वसतनवी का विरोध करने के लिए पूरा ठेका ही दे दिया है। पिछले कई दिनों से इस अखबार में पहले पृष्ठ पर सिर्फ वसतनवी के खिलाफ ही खबरें प्रकाशित हो रही हैं। इस अखबार में देश की दूसरी सभी बड़ी खबरें इन दिनों गायब रहती हैं इसमें सिर्फ यही छप रहा है की वसतनवी ने यह गलत किया और वो गलत किया। कभी उन्हें आर एस एस का एजेंट कहा जा रहा है तो कभी उनके खिलाफ फतवा जारी करके यह कहा जा रहा है की मूर्ति भेंट करने के बाद अब वो मुसलमान ही नहीं रहे। खबर यह है की उर्दू के दो अखबारों ने एक बड़े मौलाना के दफ्तर में एक सौदेबाज़ी की की अगर वसतानवी इस दोनों अखबार को एक एक लाख रूप्य दे दें तो हम उन के खिलाफ खबर नहीं छपेंगे। मगर वसतानवी ने ऐसा नहीं किया और यही वजह है की उनके वीरोध में खबर और लेख के छपने का सिलसिला जारी है। यानि अगर इन दो अखबारों को लाख लाख रूपये मिल जाते तो मोदी की तारीफ भी गलत नहीं होती और एक मौलाना के जरिया किसी को मूर्ति भेंट करना भी इस्लाम के वीरुध नहीं होता। ज़रा ग़ौर कीजिये इस बात पर। कितना घिनौना खेल खेला जा रहा है इस संस्था के नाम पर । कमाल की बात तो यह है की वासतानवी के फिलहाल गुजरात चले जाने के बाद भी घिनौना खेल जारी है। उर्दू अखबार सहाफ़त ने वसतनवी के खिलाफ लिखने में सारी हदें पार कर दी हैं। यही कारण है की देवबंद में इस अखबार की कापियाँ भी जलायी गईं। मुसलमानों से अपील भी की जा रही है की इस अखबार को पढ्न बंद करें कियुंकी यह मूसलामों की एक बड़ी संस्था को बर्बाद करने पर तुला हुआ है।
इस सारे मामले में सबसे बड़े अफसोस की बात तो यह है की वासतानवी के खिलाफ यह सारा खेल पर्दे के पीछे से एक ऐसे मौलाना खेल रहे हैं जिन्हें भारतिए मुसलमान बड़ी इज्ज़त की निगाह से देखता है। सच्चाई यह है की दुनिया के दूसरे धर्मों के मानने वालों की तरह मुसलमानों में भी कुर्सी की लड़ाई है। एक ओर जहां राजनेता मुसलमानो को मात्र एक वोट बैंक समझते हैं वहीं मौलाना हाजरात भी मुसलमानों के जज़्बात से खेलते हैं। जिस तरह बाल ठाकरे , नरेंद्र मोदी, विनय कठियार जैसे लोग अपने लाभ के लिए किसी बी हद तक जा सकते हैं उसी तरह मुसलमानों में भी ऐसे बहुत से लोग है जो बड़ी गंदी सियासत में लिप्त है। अफसोस की बात तो यह है की ऐसी हरकत वो लोग कर रहे हैं जो बड़े बड़े मौलाना कहलाते है। हजारों मुसलमान ऐसे हैं जो इन्हें इज्ज़त की नज़र से देखते हैं और आँख बंद करके इन पर भरोसा करते हैं। इन मौलाना लोगों में से सब ने गैरसरकारी संगठनों के नाम पर कई कई संस्था बनाकर अपनी अपनी दूकानें खोल ली है और आम मुसलमानों को उल्लू बनाकर अपनी अपनी दुकान चला रहें है। इन दिनों दारुल उलूम देवबंद में जो खेल जारी है उसकी असलियत का पता हर बड़े मौलाना को है। सबको पता है की वसतनवी का सही मायेने में विरोध कौन लोग कर रहे हैं और उनके विरोध की वजह किया है। सब को यह भी पता है की वसतनवी के खिलाफ मोर्चा किसने और किस मक़सद से खोला हुआ है। मगर कोई कुछ नहीं बोल रहा हैं। कारण यह है की हर किसी को अपनी अपनी दुकान चालानी है। संस्था में हँगामा हुआ, विद्यार्थी ज़ख्मी हुये, पढ़ाई डिस्टर्ब हो रही है मगर इसकी चिंता किसी को नहीं हैं।
दारुल उलूम में ठीक ऐसी ही स्थिति 30-32 साल पहले भी पैदा हुई हुई थी। तब मौलाना कारी तैयब साहब दारुल उलूम के मोहतमीम थे। इन्हीं लोगों ने जो आज पर्दे के पीछे से वसतनवी के खिलाफ मोर्चा खोले हुये हैं ने उस समय भी खूब हंगाम किया था। तैयब साहब ने तब हार मान कर सब कुछ उन लोगों के हवाले कर दिया था जो इसे अपनाना चाहते थे। उस समय भी हंगामे में कई विद्यार्थी ज़ख्मी भी हुये थे और एक मौलाना साहब जो आज भी बड़े मौलाना हैं ने उस समय दोनों हाथों से विद्यार्थियों पर गोली चलाई थी। हद तो तब हो गयी जब इसी मौलाना ने एक विद्यार्थी के मुंह में उस समय पेशाब करवा दिया जब उसने प्यास से पानी की मांग की । कुल मिलाकर विद्यार्थियों का इस्तेमाल कर के आज एक बार फिर दारुल उलूम पर क़ब्ज़े की तैयारी हो रही है । इस संस्था पर हमेशा एक खास ग्रूप का कब्जा रहा है और अब जबकि गुजरात का एक मौलाना इस संस्था पर क़ाबिज़ हो गया है तो यह बात इस ग्रूप को पच नहीं रही है और इस मौलाना यानि वसतनवी को हटाने के लिए वो किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। एक सीधी सी बात यह है की यदि गवार्निंग काउंसिल को लगता है की मौलाना वासतानवी इस ओहदे के लायक नहीं हैं तो हंगामा करने के बजाए उन्हें सीधे से हटा दिया जाये। सब से खास प्रश्न तो यह है की दारुल उलूम देवबंद किसका है? अगर यह किसी एक खानदान का है तो यह पूरी तरह से उसी को सौंप दिया जाये और अगर यह संथा पूरे मुसलमानों की है और यहाँ कोई समस्या पैदा हुई है तो इसके लिए हर बड़े मौलाना को सामने आना चाहिए। अगर सब लोगों को यह लगता है की वसतानवी जैसी सोच का आदमी इस संस्था के लिए उचित नहीं होगा तो उसे हटा दिया जाये मगर यह फैसला तो गवार्निंग काउंसिल को करना है मगर बड़े बड़े मौलाना पर्दे के पीछे से जो खेल खेल रहें है किया वो शर्मनाक नहीं है। वैसे तो वासतानवी की किस्मत का फैसला 23 फरवरी को गवार्निंग काउंसिल की मीटिंग के बाद होगा इस दौरान देवबंद पर क़ब्ज़े की इस राजनीति में कौन कौन से गेम होते हैं देखते रहिए।

सोमवार, जनवरी 10, 2011

दिल्ली से एक और उर्दू अखबार


भारत में उर्दू के समाचारपत्रों की हालत कभी भी अच्छी नहीं रही। इस के बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों खास तौर पर दिल्ली से उर्दू अखबारों के निकलने का सिलसिला हर दौर में जारी रहा। अखबार निकलते रहे और साल दो साल या फिर चार साल के बाद बंद होते रहे। हाल ही में दिल्ली से उर्दू का एक और अखबार जदीद मेल के नाम से निकला है। वैसे तो शुक्रवार को यह अखबार पहली बार मार्केट में आया मगर उस पर अंक नंबर 61 लिखा हुआ है। इसके चीफ एडिटर जाने माने पत्रकार जफर आग़ा हैं जबकि एडिटर हाजी अब्दुल मालिक है जो इस अखबार के मालिक भी हैं। अखबार के प्रिंटर और पब्लिशर आली हैदर रिजवी हैं। रिजवी पहले सहाफ़त अखबार में थे। किसी विवाद के बाद रिजवी सहाफ़त से अलग हो गए और उनहों ने एक दूसरा अखबार उर्दू नेट निकाला। बाद में कुछ ही दिनों चलने के बाद उर्दू नेट भी बंद हो गया। उर्दू का यह नया अखबार कितने दिन चलेगा यह तो एक अलग सवाल है मगर एक मुख्य प्रश्न यह है की जब राष्ट्रीय सहारा के अलावा दिल्ली से निकालने वाले उर्दू के सभी अखबार आर्थिक तंगी की वजह से रोते रहते हैं, किसी ने खर्च में कमी लाने की नियत से दिल्ली से बाहर अखबार भेजना बंद कर दिया है तो कोई अखबार बेचने के लिए खरीदार तलाश रहा है। ऐसे में एक नए उर्दू अखबार की शुरूआत बड़े आश्चर्य की बात है।
उर्दू अखबार के साथ एक बड़ा मसला यह है की उन्हें विज्ञापन बहुत कम मिलते हैं। कम सर्कुलेशन की वजह से प्राइवेट विज्ञापन तो मुश्किल से मिलता ही है अब डी ए वी पी के विज्ञापन में कमी के कारण भी उर्दू अखबार की हालत खराब हो गयी है। पिछले दिनों जब उर्दू वालों को डी ए वी पी के विज्ञापन बहुत कम मिलने लगे तो उर्दू अखबार के मालिक और संपादकों ने इस समस्या को लेकर कई नेताओं समेत प्रधान मंत्री से भी मुलाकात की। उन्हें उनकी समस्याओं के हल का आश्वासन भी दिया गया मगर अब तक यह समस्या हल नहीं हुई है। लगभग एक साल बीत चुके है तब से लेकर अब तक उर्दू वालों का नेताओं और अफसरों से मिलने का सिलसिला जारी है। इस सिलसिले में एक बात यह देखने में आ रही है की अपनी आदत के अनुसार उर्दू का हर अखबार एक दूसरे की काट करने में लगा है। हर संपादक या मालिक की यही कोशिश है की नेता से उसकी पहचान ज़्यादा बने और अगर सरकार उर्दू अखबार के लिए कुछ खास ऐलान करे तो उसका लाभ उसे हो। फिलहाल दिल्ली से 47 उर्दू के ऐसे अखबार प्रकाशित हो रहें हैं जिनको डी ए वी पी से विज्ञापन मिलता है। इन 47 में से अधिकतर ऐसे है जो सिर्फ उसी दिन प्रक्षित होते हैं जिस दिन उनको विज्ञापन मिलता है उसके अलावा यह अखबार कहाँ से प्रकाशित होते हैं और कहाँ जाते है यह किसी को पता नहीं है। दिल्ली में फिलहाल मार्केट में उर्दू के जो अखबार नज़र आते है वो हैं राष्ट्रीय सहारा, हिंदुस्तान एक्सप्रेस, सहाफ़त और हमारा समाज। इन के अलावा जो अखबार निकलते वो सिर्फ सरकारी दफ्तरों में जाते हैं। इनमें कॉर्पोरेट का अखबार होने की वजह से सिर्फ सहारा ही ऐसा है जिसकी आर्थिक हालत अच्छी है बाक़ी के अखबार जैसे तैसे कर के चल रहें हैं। जिस अखबार के मालिक तेज़ और चालाक हैं वो तो कहीं न कहीं से अखबार चलाने के लिए पैसा निकाल ही लेते हैं जिनको यह फन नहीं आता वो अपनी हिम्मत से अखबार निकाल तो रहें है मगर कब तक निकलते रहेंगे यह कहना मुश्किल है। उर्दू अखबारों की आर्थिक तंगी के बावजूद एक नए अखबार ने दिल्ली में दस्तक दी ह। अखबार के मालिक ने ऐसी हिम्मत कैसे कर ली और यह अखबार कितने दिनों तक चलेगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

बुधवार, दिसंबर 22, 2010

सचिन तेरा जवाब नहीं !


इसी साल 11 अक्टूबर को जब सचिन तेंदुल्कर ने अपने टेस्ट कैरियर की 49 वीं संचूरी बनाई थी तो उस के बाद हर कोई बस उसी दिन का इंतज़ार कर रहा था की वो दिन जल्दी आए और सचिन अपने शतकों का अर्धशतक मुकम्मल कर लें। अंततः वो दिन भी आ गया और सचिन ने अपने शतकों का अर्धशतक भी पूरा कर लीया। यह अफसोस की बात है की भारत को इस टेस्ट में हार का मुंह देखना पड़ा मगर इतने कठिन हालत में भी शतक बना कर सचिन ने बता दिया की उनमें अभी भी न केवल बहुत किरकेट बची है बल्कि वो किसी भी दूसरे बल्लेबाज़ से बेहतर हैं। इस टेस्ट में सचिन 111 रन बना कर अविजित रहे हो सकता है उन्हें यदि कुछ खिलाड़ियों का साथ मिला होता तो वो इस टेस्ट को बचाने में सफल भी हो जाते। एक लंबे समय से किरकेट खेलते आ रहे सचिन के नाम रिकार्डों की एक लंबी फेहरिस्त है। सचिन के नाम पर वनडे मैचों में 46 शतक दर्ज हैं और इस तरह से वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतकों का सैकड़ा पूरा करने के करीब हैं। अब सचिन के चाहने वालों को उस दिन का इंतज़ार है जब वो इंटरनेशनल किरकेट में शतकों का शतक पूरा करेंगे। इन दिनों सचिन जिस फार्म में हैं उस से तो यही लगता है की वो दिन भी दूर नहीं जब सचिन यह उपलब्धि भी हासिल कर लेंगे। टेस्ट किरकेट में एक शतक की तमन्ना रखने वाले खिलाड़ियों की कमी नहीं है मगर जब कोई खिलाड़ी एक दो नहीं बल्कि 50 शतक पूरे कर ले तो उसका इस उपलब्धि पर नाज़ करना और घमंड दिखाना लाज़मी है मगर कमाल के हैं सचिन जो पचास शतक लगाने के बाद भी कुछ ऐसे नज़र आते हैं जैसे उनहों ने कोई कमाल किया ही नहीं। तेंदुलकर यह उपलब्धि हासिल करने वाले न सिर्फ दुनिया के पहले बल्लेबाज ही नहीं बने है बल्कि ऐसा लगता है उनके इस रिकार्ड तक पहुंचना अब किसी दूसरे बल्लेबाज़ के बस का नहीं है। सब से अधिक शतक के मामले में पोंटिंग 39 शतक के साथ दूसरे जबकि जैक्स कालिस 38 शतक लगाकर तीसरे नंबर पर हैं। तेंदुलकर दुनिया के उन गिने चुने बल्लेबाजों में शामिल हैं जिन्होंने टेस्ट खेलने वाले हर देश के खिलाफ शतक लगाए हैं। उन्होंने सर्वाधिक 11 शतक आस्ट्रेलिया के खिलाफ बनाए हैं। इसके बाद श्रीलंका का नंबर आता है जिसके खिलाफ सचिन ने नौ शतक लगाए हैं। इन के अलावा सचिन ने इंग्लैंड के खिलाफ सात शतक, दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ छह शतक, बांग्लादेश के खिलाफ पांच शतक, न्यूजीलैंड के खिलाफ चार शतक, वेस्टइंडीज और जिंबाब्वे के खिलाफ तीन-तीन शतक और पाकिस्तान के खिलाफ दो शतक लगाए हैं. अपने पचास शतकों में से से उन्होंने 22 शतक स्वदेश में जबकि 28 शतक विदेश में लगाए हैं।
तेंदुलकर ने अपना पहला टेस्ट शतक 20 साल से भी अधिक समय पहले 14 अगस्त 1990 को इंग्लैंड के खिलाफ मैनचेस्टर में बनाया था। भारत की तरफ से सबसे कम उम्र में शतक लगाने वाले बल्लेबाज तेंदुलकर ने अपना 10वां शतक भी इंग्लैंड के खिलाफ नाटिंघम में 1996 में लगाया था।सचिन ने अपना 20 वां शतक अक्टूबर 1999 में न्यूजीलैंड के खिलाफ लगाया। उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ ही 2002 में लीड्स में 30वां शतक लगाकर सर डान ब्रैडमैन को पीछे छोड़ा था और फिर दस दिसंबर 2005 को श्रीलंका के खिलाफ दिल्ली में 35वां शतक जमाकर हमवतन सुनील गावस्कर के रिकार्ड को तोड़ा था। सचिन ने अपना 40 वां शतक नवंबर 2006 में लगाया.
किरकेट में यह बहस काफी दिनों से हो रही है की ऑस्ट्रेलिया के सर डॉन ब्रेडमैंन के बाद सब से अच्छा बल्लेबाज़ कौन है। मगर पिछले एक दो सालों से अब एक नई बहस यह शुरू हुई है की सचिन बेहतर हैं या डॉन ब्रेडमैंन। आस्ट्रेलियाई अखबार ने इस संबंध में बाकायदा आनलाइन सर्वे कराया जिसमें सचिन को विजेता घोषित किया गया। वहाँ के अखबार 'सिडनी मार्निंग हेराल्ड' ने अपने आनलाइन सर्वे में 'सबसे महान क्रिकेटर-ब्रैडमैन या तेंदुलकर?' लोगों को वोट करने के लिए कहा है जिसमें 20,768 क्रिकेट प्रशंसकों ने अपने मत दिए। इसमें तेंदुलकर को 67 और ब्रैडमैन को 33 प्रतिशत मत मिले। खैर उस समय और मौजूदा समय के हालात अलग अलग हैं इस लिए यह बहस करना कोई बहुत बेहतर नहीं है की सचिन बेहतर है या ब्रैडमैन बेहतर थे मगर इतना तो तै है की सचिन अब तक के टॉप 10 बल्लेबाज़ में ज़रूर आएंगे और जैसा की सर्वे से साबित हुआ की वो टॉप दस में नहीं बल्कि किसी दूसरे बल्लेबाज़ का नंबर सचिन के बाद ही आता है।
सचिन ने अपने पूरे करियर में एक दू नहीं बल्कि अनेक रिकार्ड बनाए हैं। इन में कुछ रिकार्ड तो ऐसे हैं जो आने वाले कुछ सालों में टूट जाएँगे मगर कई ऐसे भी है जिनके टूटने पर शक है। यही कारण है की कई पूर्व किरकेटरों ने माना है की एक आम इंसान इतने दिनों तक इतना बेहतर तरीके से नहीं खेल सकता। कमाल की बात यह है की जिस सचिन ने अनेक रिकार्ड बनाए हैं उस सचिन के लिए कई रिकार्ड ऐसे हैं जो न सिर्फ अभी भी उनकी पहुँच से दूर हैं बल्कि इन में कुछ ऐसे है जिन तक पहुंचना सचिन के लिए संभव नहीं है। टेस्ट किरकेट में एक पारी में सब से बड़ा स्कोर, प्रथम श्रेणी किरकेट की एक पारी में सब से बड़ा स्कोर, प्रथम श्रेणी किरकेट में सब से अधिक शतक, प्रथम श्रेणी में सब से अधिक रन, एक टेस्ट में सब से अधिक रन, एक दिन में सब से अधिक रन और एक कलेंडर साल में सबसे अधिक रन। यह सब बलेबाजी के ऐसे रिकार्ड हैं जिन पर सचिन का कब्जा नहीं है। टेस्ट की एक पारी में सब से ज़्यादा रन बनाने का रिकार्ड वेस्ट इंडीज के ब्रायन लारा के नाम है। लारा 400 रन की पारी खेल चुके हैं। उसी प्रकार लारा ने प्रथम श्रेणी में एक बार अविजित 501 रन भी बनाए हैं। जहां तक लारा ने टेस्ट में दो बार 300 से अधिक रन बनये हैं वहीं सचिन ने अब तक टेस्ट में 250 का आंकड़ा भी नहीं छुआ है। उनका टेस्ट में सब से बड़ा सकोरे 248 रन है जो उनहों ने बांग्लादेश के खिलाफ दिसंबर 2004 में बनाए थे। प्रथम श्रेणी किरकेट में भी सचिन ने कभी 300 रन नहीं बनाए हैं। प्रथम श्रेणी किरकेट में सचिन ने 77 शतक लगाए हैं जबकि इस सिलसिले का रिकार्ड इंग्लैंड के जॅक हॉब्स के नाम है जिन्हों ने अपने करियर में 199 शतक लगाए। उसी प्रकार हॉब्स ने प्रथम श्रेणी में 61 हज़ार से अधिक रन बनाए जबकि सचिन ने प्रथम श्रेणी में अब तक 23406 रन बनाए हैं। किसी एक टेस्ट में सब से ज़्यादा रन बनाने का रिकार्ड इंग्लैंड के ग्राहम गूच के नाम है। गूच ने भारत के वीरुध दोनों परी में शतक बनाते हुये 456 रन बनाए थे जब की सचिन का किसी एक टेस्ट में सब से अधिक रन 301 रन है। इतने रन सचिन ने 2004 में सिडनी में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ बनाए थे। एक ओर जहां सचिन ने अभी तक किसी सिरीज़ में 500 से अधिक रन नहीं बनाए हैं वहीं किसी एक सिरीज़ में सब से अधिक रन बनाने का रिकार्ड ब्रैडमैन के नाम है उनहों ने एक सिरीज़ में इंग्लैंड के खिलाफ 974 रन बनाए थे। ब्रैडमैन ने एक बार एक ही दिन में 309 रन बनाए थे जबकि सचिन ने अभी तक कभी भी एक दिन में 200 रन भी नहीं बनाए हैं। एक कलेंडर साल में भी सब से अधिक रन बनाने का रिकार्ड साचीन के बजाए किसी और खिलाड़ी के नाम है। पाकिस्तान के मोहम्मद युसुफ ने 2006 में 1788 रन बनाए थे जो की एक साल में सब से अधिक रन का रिकार्ड है। युसुफ के नाम एक साल में सब से अधिक नौ शतक का रिकार्ड भी है। सचिन ने अब तक एक साल में सात शतक तक लगाए हैं। इस तरह और भी कई रिकार्ड ऐसे हैं जो सचिन के बजाए किसी और खिलाड़ी के नाम दर्ज है मगर इस से उनकी महानता कम नहीं होती और अब सारी दुनिया ने उन्हें विश्व का सब से बड़ा बल्लेबाज़ मान लिया है।

सोमवार, नवंबर 29, 2010

नितीश की आँधी में बुझ गई लालटेन, उजड़ गई झोपड़ी


यह तो पहले ही तय हो गया था की बिहार के इलेक्शन में नितीश कुमार और उनकी टीम को सफलता मिलेगी मगर सफलता इतनी बड़ी होगी की लालू की लालटेन का तेल खत्म हो जाएगा और पासवान की झोपड़ी उड़ जाएगी इसका अंदाज़ा किसी को नहीं था। पासवान की झोपड़ी तो उडी ही लालू की पार्टी का भी यह हाल हुआ की अब बिहार में विपक्ष नाम की कोई चीज़ ही नहीं बची। फ़ेसबुक पर मेरे एक मित्र परवेज़ अहमद ने सही लिखा है कि बिहार की जनता को अब लालटेन नहीं बल्कि हैलोजन लैम्प चाहिए। यह सही भी है। जब हमेशा बिजली मिलने लगेगी तो फिर लालटेन का क्‍या काम। लालटेन तो पुरानी चीज़ हो गयी, उसमें बार बार किरासन तेल डालने का झंझट भी है। यही मामला झोपड़ी के साथ भी है। हर कोई चाहता है की उसका विकास हो, उसे भी अच्छे दिन देखने को मिलें और उसका घर भी पक्का का हो जाए। यही सही भी है झोपड़ी में रहने की तमन्ना क्‍यों की जाये पक्के मकान का ख्‍वाब क्‍यों न देखा जाये। हालांकि लोकतंत्र में विपक्ष का नहीं होना अच्छी बात नहीं है, मगर जब कोई इस लायक हो जाये की उसे वोट ही न मिले तो कोई दूसरा क्या करे। नितीश एंड कंपनी को जो शानदार सफलता मिली है, उस से यह साबित हो गया है कि फिलहाल बिहार में वही जनता की सब से पहली पसंद हैं और उनके मुकाबले में जनता ने लालू और पासवान को घास नहीं डाली।
लालू और पासवान को भी अब इस बात का अंदाज़ा अच्छी तरह से हो गया होगा कि बिहार के लोग बिहारी तो हैं, मगर दिल्ली वाले 'बिहारी' नहीं हैं। इस बार जनता ने इन दो नेताओं का जो हाल किया है उसे वो काफी दिनों तक भूल नहीं पाएंगे। आखिर इन दोनों को यह बात समझ में क्‍यों नहीं आती की जनता को विकास चाहिए, उसे किसी के बेटे या बीवी से क्या मतलब? लालू और पासवान दोनों ने अपने अपने बेटे को इलेक्शन में घुमाया। मगर जनता ने उन्हें उनकी औकात बता दी और बता दिया कि न तो लालू का बेटा अजहरुद्दीन है और न ही पासवान का बेटा संजय दत्त। एक ने कोई ऐसा मैच ही नहीं खेला कि उसे याद रखा जाये, दूसरे ने कभी कोई फिल्म भी बनाई है इसका किसी पता ही नहीं। रहा सवाल पत्नी का तो राबड़ी देवी में ऐसी कौन सी खूबी है कि जनता उसे वोट दे। जनता को तो यह पता था कि पति ने तो हमें लूटा ही इस महिला ने भी खूब लूटा तो फिर दोबारा अवसर क्‍यों दिया जाये। यही कारण है की राबड़ी दो स्थानों से इलेक्शन लड़ी और दोनों जगह से हार गयीं। पासवान के भाई का भी बुरा हाल हुआ।
लालू और पासवान जी को जनता ने अपना जनादेश सुना कर यह बताने की कोशिश की है कि अब बिहार के लोगों में भी समझ आ गयी है। उन्हें भी लगने लगा है कि जात-पात और धर्म की राजनीति बकवास की चीज़ है। सब से ज़रूरी चीज़ है विकास। विकास के बिना सब कुछ बेकार है। क्या बिहारी नहीं चाहते की उनके घर में भी बिजली आए, क्या बिहारी नहीं चाहते की बिहार की सड़कें भी देश के दूसरे राज्यों की सड़कों जैसी हों, क्या बिहारी यह नहीं चाहते की जब वो शाम को दिन भर काम करके अपने घर लौटें तो उन्हें कोई लूटे नहीं, क्या बिहार के ठेकेदार यह नहीं चाहते उनसे कोई रंगदारी टैक्स नहीं ले, क्या स्कूल के विद्यार्थी यह नहीं चाहते कि उनका टीचर पाबंदी से स्कूल आए, क्या कॉलेज के विद्यार्थी यह नहीं चाहते की देश के दूसरे कॉलेज और यूनिवर्सिटी की भांति उनका सेशन लेट न हो। बिहार में भी ऐसा ही चाहने वाले लोग हैं और उन्हें ऐसा माहौल दिया जा रहा है या फिर ऐसा माहौल देने की हर संभव कोशिश की जा रही है, तो फिर नितीश एंड कंपनी की मदद क्‍यों नहीं की जाये। उन्हें वोट क्‍यों नहीं दिया जाये। इलेक्शन से पहले ऐसा कहने वालों की कमी नहीं थी कि बिहार में जात-पात के आधार पर इलेक्शन होता है, इसलिए नितीश ने लाख काम किए हों मगर लालू और पासवान को भी बहुत सीटें मिलेंगी। मगर इलेक्शन के नतीजे ने बता दिया कि दूसरे राज्यों की भांति बिहार के लोगों को भी विकास पसंद है और वो भी उसे वोट देंगे जो उनके विकास की बात करेगा। सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि अब तो सारा देश देख रहा है कि नितीश के आने के बाद बिहार में काफी काम हुये हैं।
ऐसा भी नहीं है की बिहार को नितीश कुमार ने जन्नत बना दिया है। अभी बहुत से काम ऐसे है जो उन्हें करने की ज़रूरत है। बहुत से काम ऐसे हैं जो उनके अफसर उन्हें बताते हैं कि हो गया मगर सही मायने में वो होता नहीं है। उन्हें काग़ज़ पर तो होता हुआ नज़र आता है मगर सच्चाई में ऐसा नहीं होता। बिहार में योजनाओं की कमी नहीं है, मगर इसका लाभ उचित तरीके से उन लोगों को नहीं मिल रहा जिन के लिए यह योजनाएँ बनी हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि फलां जगह इतने लोगों के नाम बीपीएल में दर्ज हैं, जबकि इतने लोगों को इंरिदा आवास योजना के तहत घर दिये गए। मगर सच्चाई यह है की बीपीएल में ऐसे लोगों के नाम भी दर्ज हैं जो महीने में हजारों कमाते हैं। इंदिरा आवास के तहत जिन लोगों को घर के लिए पैसे मिलते हैं उन्हें भी पूरी रकम नहीं मिलती। शिक्षा में सुधार तो हुआ है मगर इसे बहुत बेहतर नहीं कहा जा सकता। अब भी कई स्कूल ऐसे हैं जहां बहुत सारे बच्चों को पढ़ाने के लिए एक ही टीचर है। बहुत सारे स्कूल ऐसे हैं जहां पीने का पानी नहीं है। बहुत सारे स्कूल ऐसे हैं जहां शौचालय भी नहीं है। अभी भी लाखों की संख्या में ऐसे बच्चे है जिन्हें स्कूल में होना चाहिए, मगर वो कहीं काम कर रहे होते हैं। यही नहीं यदि अचानक स्कूल मुआयना किया जाये तो बहुत से स्कूल में टीचर ग़ायब रहते है।
अफसोस की बात यह है कि सर्व सिक्षा अभियान के तहत जो किताबें मुफ्त बांटे जाने के लिए होती हैं उन्हें कहीं कहीं खरीद कर हासिल किया जाता है। बहुत से स्कूल ऐसे हैं जिनमें शिक्षकों की कमी है। जो हैं भी वो पढ़ाने में रूचि नहीं लेते। स्कूल में बच्चों को खिलाने के लिए जो अनाज आता है उसे कोई और लेकर चला जाता है। स्कूल के टीचर और मुखिया मिलकर इसे बाज़ार में बेच देते हैं। आवासीय प्रमाण-पत्र या फिर जन्म या मृत्‍यु प्रमाण-पत्र बनवाना हो बिना पैसे के बिना यह चीज़ें नहीं बनती। स्कूल में मुफ़्त खाने की बात कही जाती है, मगर कई स्कूल ऐसे हैं जहां हफ्तों हफ्तों खाना नहीं बनता। शिक्षा मित्र के तौर पर जो टीचर बच्चों को पढ़ा रहें हैं उनमें कई ऐसे है जिन्हें अभी खुद पढ़ने की ज़रूरत है। शिक्षा मित्रों को अपनी सेलरी के लिए मुखिया की, चाहे वो अनपढ़ ही क्‍यों न हो, मालिश करनी पड़ती है। ऐसे टीचरों को रिश्वत देने के बाद ही सेलरी मिलती है। टीचर आगे किसी से इसकी शिकायत भी नहीं कर सकते क्‍योंकि उन्हें पता है कि वो भी बेईमानी से ही टीचर बने हैं। कुल मिलाकर नितीश जी के बहुत काम करने के बाद भी अभी बहुत कुछ करने की ज़रूरत हैं। नीचे से लेकर ऊपर तक रिश्वत लेने-देने का सिलसिला जारी है। इस पूरी बेइमानी में छोटे मोटे दलाल, मुखिया, ग्राम सेवक, बीडीओ और दूसरे सभी अफसर शामिल हैं। जो अफसर लालू प्रसाद के जमाने में बेईमान थे वो अब भी बेईमान हैं। बिहार में जब कई साल बाद मुखिया इलेक्शन हुआ तो लूले-लँगड़े सब मुखिया बन गए। इससे लोगों का तो भला नहीं हुआ मुख्य लोग ग़रीब से अमीर बन गए। अब जबकि नितीश को जनता ने एक और अवसर दिया है तो उन्हें चाहिए कि इन सब खामियों पर क़ाबू पा कर वो जनता की आशाओं पर खड़े उतरें ताकि वो  एक मिसाली मुख्यमंत्री बन सकें।

मंगलवार, नवंबर 23, 2010

कैसे साफ होगी खेल संघों में जमी मैल!

दिल्ली हाईकोर्ट ने देश के खेल महासंघों के अहम पदों पर कई सालों से कब्जा जमाए बुजुर्गों को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि सरकार अपनी खेल नीति लागू करे, जिसके तहत किसी भी खेल महासंघ के प्रमुख पदों पर अब 70 साल से अधिक उम्र का व्यक्ति आसीन नहीं रह सकता। खेल मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक भारतीय ओलंपिक महासंघ समेत देश के तमाम राष्ट्रीय खेल महासंघों का अध्यक्ष बारह साल से अधिक और अन्य पदों पर बैठा व्यक्ति आठ साल से अधिक समय तक अपने पदों पर नहीं रह सकता। ज्ञात रहे कि राष्ट्रीय खेल संघों के शीर्ष पदाधिकारियों के कार्यकाल की अवधि और बारी तय करने के खेल मंत्रालय के फैसले के बाद यह तय हो गया था कि भारतीय ओलम्पिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी और उन जैसे कई नेताओं के लिए, जो कई कई सालों से खेल संघों पर कब्जा जमाए हुए हैं, परेशानी खड़ी हो जाएगी। यही हुआ भी।
जब सुरेश कलमाडी, विजय कुमार मल्होत्रा, प्रिय रंजन दास मुंशी, जगदीश टाइटलर, जे एस गहलोत, दिगविजय सिंह, यशवंत सिंह और इन जैसे दुसरे नेताओं, ब्यूरोक्रेट और बिजनेसमैन को यह लगने लगा है कि यदि मंत्रालय अपने मकसद में सफल हो गया तो हमारी दुकान तो बंद हो जाएगी, तो इन लोगों ने आपस में मिलकर इस फैसले का विरोध शुरू कर दिया। खेल मंत्रालय के फैसले से जिस-जिस को नुकसान हो सकता था वह सब आपस में मिल गए, इन सबों की यही कोशिश है कि कुछ भी हो खेल संघों पर कब्जा बनाए रखना है। मगर कोर्ट के फैसले से इन सभी को एक बड़ा झटका लगा है।
खेल संघों पर अपनी अपनी नेतागिरी या दादागिरी बचाने के लिए भारतीय ओलम्पिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी और राष्ट्रीय खेल संघों के सात पदाधिकारियों ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिल कर इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की। उस समय प्रधानमंत्री ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया कि वे इस मामले पर गौर करेंगे। कलमाड़ी ने साफ किया कि अगर ये खेल मंत्रालय के दिशानिर्देश लागू किये गये तो इसका देश की खेल गतिविधियों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। कलमाडी जैसी सोच उन दूसरे नेताओं की भी है जो विभिन्न राष्ट्रीय खेल संघों पर कब्जा करके खेलों की लुटिया डुबो रहे हैं। सच्चाई यह है कि आज दुनिया में खेलों में हमारी जो खराब हालत है इसके जिम्मेदार यही वह लोग हैं, जिनका खेलों से कभी कोई वास्‍ता नहीं रहा मगर यह विभिन्न राष्ट्रीय खेल संघों से ऐसे चिपके हुए हैं जैसे कि जोंक। इन में से हो सकता है कि किसी को थोड़ा बहुत खेल की जानकारी हो, मगर खेल संघों पर लगी इस जंग को साफ करना जरूरी है। जहां तक खेल मंत्रालय का सवाल है तो मंत्रालय चाहता है कि ये लोग अपना टर्म पूरा होते ही गद्दी छोड़ दें, ताकि संघों के कामकाज में पारदर्शिता आए और देश में खेलों के विकास के लिए काम शुरू हो सके।
इस बात से हर कोई अवगत है कि शीर्ष पदों पर बैठे इनमें से कई अधिकारी अपने रसूख के बल पर खिलाड़ियों के चयन से लेकर संघ के कामकाज में दखलअंदाजी करते रहे हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि उन की मनमानी के कारण ही खेल में भाई-भतीजवाद का सिसिला शुरू हुआ और वास्तविक प्रतिभाएं सामने नहीं आ पाई। पिछले दिनों हॉकी खिलाड़ियों के साथ जो कुछ हुआ वह इसका स्पष्ट उदाहरण है।
एक स्टिंग आपरेशन में भी यह बात सामने आई थी कि खेल अधिकारी खिलाड़ियों को टीम में शामिल करने के लिए उनसे रिश्वत लेते थे। इन बेईमान खेल अधिकारियों की वजह से ही पिछले कुछ सालों में हमने देखा कि हाकी में हमारी हालत कितनी खराब हो गयी। पिछले 80 साल में पहली मर्तबा हमारी हॉकी टीम ओलिंपिक के लिए क्वॉलिफाई तक नहीं कर पाई। अन्य खेलों में भी खिलाड़ियों और खेल संघ के अधिकारीयों के बीच चलने वाली रस्साकशी अक्सर देखने को मिली है। राजनेता, नौकरशाह या बिजनेसमैन जो कहें सच्चाई यह है और जनता भी यही चाहती है कि एक तो राष्ट्रीय खेल संघों में नेताओं को जगह ही नहीं मिले और दूसरे यदि नेता खेल संघों में आ भी जाएं तो यह तय हो कि वह तय सीमा तक ही इस पद पर रहेंगें।
यह मजाक नहीं तो और क्या है कि लालू प्रसाद यादव पिछले नौ सालों से बिहार क्रिकेट एसेसिएशन के अध्यक्ष बने हुए हैं। देश में क्रिकेट में बिहार की हालत आज क्या है वह हर किसी को पता है। पता नहीं विजय कुमार मल्होत्रा को तीरंदाजी कितनी आती है, मगर यह तो शर्मनाक है कि वह भारतीय तीरंदाजी संघ के अध्यक्ष पद पर 31 सालों से काबिज हैं। फारूक अब्दुल्ला ने तो और भी कमाल किया हुआ है। हमें नहीं पता कि फारूक अब्दुल्लाह को कितनी क्रिकेट आती है, मगर वह 2006 में जम्मू कश्मीर क्रिकेट एसेसिएशन के आजीवन अध्यक्ष निर्वाचित हो गए। अगर देश में खेलों की हालत बेहतर करनी है तो सरकार को अपने फैसले पर कायम रहना होगा, नहीं तो खेलों की दुनिया में हम और भी पीछे चले जाएंगे। अब कोर्ट ने भी सरकार की बात मानी है इसलिए उम्मीद है कि आने वाले दिनों में हमें खेल संघों में बुजुर्गों को नहीं देखना पड़ेगा।

मैल जिसे साफ करने की जरूरत है

सुरेश कलमाड़ी
कांग्रेस सांसद
उम्र-66 वर्ष
15 साल से भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष
एथलेटिक्स फेडरेशन के मुखिया

प्रियरंजन दास मुंशी
कांग्रेस संसद
उम्र-64 वर्ष
19 साल तक आल इंडिया फुटबाल फेडरेशन के प्रमुख रहे। अब प्रफुल्ल पटेल प्रमुख

अभय सिंह चौटाला
इनलो विद्यायक
उम्र-47 वर्ष
8 साल से भारतीय एमेच्योर बाक्सिंग फेडरेशन के अध्यक्ष

नरेंद्र मोदी
उम्र-59 वर्ष
लगातार तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री
गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष

वीके मल्होत्रा
भजपा विद्यायक
उम्र-79 वर्ष
31 साल से भारतीय तीरंदाजी संघ के अध्यक्ष पद पर काबिज़

जगदीश टाइटलर
कांग्रेस नेता
उम्र-66 वर्ष
14 साल से जूडो फेडरेशन आफ इंडिया के अध्यक्ष पद पर कायम

जेएस गहलोत
कांग्रेस नेता
उम्र-65 वर्ष
पिछले 24 साल से भारतीय एमेच्योर कबड्डी संघ के अध्यक्ष

अजय सिंह चौटाला
इनेलो विद्यायक
उम्र-49 वर्ष
पिछले आठ साल से टेबल टेनिस फेडरेशन आफ इंडिया के अध्यक्ष

यशवंत सिन्हा
उम्र-72 वर्ष
नौ साल से आल इंडिया टेनिस एसोसिएशन के अध्यक्ष

सुखबीर सिंह बादल
उम्र-47 वर्ष
मुख्यमंत्री, अकाली दल (बादल) के अध्यक्ष
पंजाब में कबड्डी और हॉकी संस्था चलाते हैं

एस. एस. ढींढसा
उम्र-74 वर्ष
शिरोमणि अकाली दल के सांसद
14 सालों तक भारतीय साइकिलिंग संघ के मुखिया रहे

शरद पवार
उम्र-69 वर्ष
राकांपा के संस्थापक और मुखिया
2005 से 2008 तक बीसीसीआई आध्यक्ष, अब आईसीसी के अध्यक्ष

अरुण जेटली
उम्र-57 वर्ष
भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री
दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष और बीसीसीआई के उपाध्यक्ष

लालू प्रसाद यादव
उम्र-62 वर्ष
राजद प्रमुख व सांसद, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री
पिछले नौ साल से बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष

फारुख अब्दुल्ला
उम्र-72 वर्ष
केंद्रीय मंत्री व जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री
2006 में जम्मू कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन के आजीवन अध्यक्ष निर्वाचित

सोमवार, नवंबर 08, 2010

नेताओं की जबान पर लगाम जरूरी


बिहार के फतुहा में एक चुनावी सभा में बहुत ही वरिष्‍ठ राजनेताओं में से एक शरद यादव ने एक तो राहुल गांधी की नकल उतारी और फिर उन पर निशाना साधते हुए कहा कि क्या आप जानते हैं, कोई कागज पर लिखता है और आप को दे देता है और आप बस इसे पढ़ देते हैं आप को उठा कर गंगा में फेंक देना चाहिए। लेकिन लोग बीमार हैं। शरद यादव ने यह जो बातें कहीं उसे पूरे देश ने टेलिवीजन पर देखा मगर जैसा कि नेता हमेशा कुछ कहने के बाद मुकर जाते हैं, शरद यादव भी मुकर गए और उसी दिन शाम होते होते कहा उन्हों ने ऐसा कुछ नहीं कहा था और उन्होंने जो कहा था उसका मतलब वह नहीं था जो समाचारों में बताया जा रहा है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि शरद यादव ने राहुल और उनके मां बाप को जो कहा वह तो कहा ही जनता को भी बीमार कह दिया। जी हां उस जनता को जिसके पास वह एक तरह से वोट की भीख ही मांगने गए थे। असलियत यह है कि नेताओं का बस एक ही मकसद होता है अपने विरोधी को नीचा दिखना और अपनी राजनीति चमकाना चाहे इस के लिए किसी भी हद तक क्यों न गिरना पड़े। कुछ ही दिनों पहले की बात है शब्द कुत्ता सुखिर्यों में था। वैसे तो इस शब्द का प्रयोग हर दौर में होता रहा है। हिन्दी फिल्मों में धर्मेन्द्र हमेशा कुत्ते मैं तेरा खून पी जाउंगा कहते आए हैं और लोग एक दूसरे को कुत्ते की मौत मारते आए हैं। मगर कुछ माह पहले कुत्ता का महत्व इस लिए बढ़ गया क्योकि इस बार इसका प्रयोग भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने किया था। लोकसभा में कटौती प्रस्तावों का समर्थन न करने के लिए भारतीय राजनीति के दो बड़े यादवों मुलायम सिंह और लालू प्रसाद पर निशाना साधते हुए गडकरी पार्टी बैठक में कहा था ”बड़े दहाड़ते थे शेर जैसे और कुत्तो के जैसे बनकर सोनिया जी और कांग्रेस के तलवे चाटने लगे।” कहने को तो गडकरी ने ऐसा कह दिया मगर उन्हें बाद में जनता का विरोध देख कर अंदाजा हो गया कि उन्हों ने मुलायम सिंह और लालू प्रसाद जैसे बड़े नेता को ऐसा कह कर एक बड़ी भूल कर दी। जब उन्हें इसका अहसास हुआ तो उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि मैंने सिर्फ एक मुहावरे का इस्तेमाल किया था और किसी को आहत करने का मेरा कोई इरादा नहीं था। मैं अपने द्वारा की गई टिप्पणी के लिए खेद व्यक्त करता हूं और अपने शब्दों को वापस लेता हूं। मेरे मन में मुलायम सिंह और लालू प्रसाद के लिए अत्यंत सम्मान है। किसी को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ठेस पहुंचाने का मेरा इरादा नहीं था। गडकरी के खेद व्यक्त करने के बाद मुलायम सिंह यादव तो कुछ नर्म पड़ गए थे मगर लालू कहां पीछे रहने वाले थे उन्हों ने कहा था गडकरी कान पकडकर माफी मांगे नहीं तो उनकी पार्टी जन-आंदोलन छेड़ेगी।

यह मामला अभी सुलझा भी नहीं था कि समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता अमर सिंह ने ‘कुत्ता प्रकरण’ में कूदते हुए सपा से भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी को उनके बयान के लिए माफ करने की अपील के साथ कहा है कि वह भली-भांति जानते हैं कि देश की राजनीति में सचमुच कुत्ता कौन है। अमर ने अपने ब्लाग पर लिखा ”गडकरी के एक बयान पर काफी तूफान मचा हुआ है। बयान पर मचे तूफान के बाद गडकरी की ओर से खेद प्रकट कर देना मामले का अंत कर देने के लिए काफी था। समाजवादी पार्टी आज कल मुद्दा विहीन है, इसलिए चर्चा में बने रहने के लिए गडकरी के खेद प्रकट करने के बाद भी उन्हें कुत्ता कह डाला। ऐसे में सपा में और गडकरी में क्या स्तरीय अंतर रहा। मुझे भली-भांति पता चल गया है कि इस देश की राजनीति में सचमुच कुत्ता कौन है।

अब प्रश्न यह है कि क्या गडकरी, शरद यादव या दूसरे नेता अनजाने में ऐसा गलत कह जाते हैं या फिर यही उनकी असलियत है। सच्चाई यह है कि भारतीय राजनीति में सिर्फ गडकरी ही नहीं ऐसे बहुत से नेता हैं जो आए दिन ऐसे शब्दों का इस्तमाल करते रहते हैं जिन्हें एक सभ्य समाज में किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। मुलायम सिंह और लालू प्रसाद तो आए दिन ऐसा कुछ न कुछ बोलते हैं जिन्हें बहुत बुरा नही ंतो अच्छा भी नहीं कहा जा सकता।

सिर्फ लालू प्रसाद ही नहीं बल्कि ऐसे नेताओं की संख्या कम नहीं है जो आए दिन कुछ न कुछ ऐसी टिप्पणी जरूर करते हैं जिसे शालीन नहीं कहा जा सकता। गत वर्ष उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी और वरूण गांधी को अपने विवादास्पद बयानों के लिए सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ी थी। मायावती के खिलाफ टिप्पणी करके रीता ने अपने लिए मुसीबत बुलाई तो वरूण गांधी ने हिंदुत्व की तरफ बढ़ने वाले हाथ को तोड़ने की बात कहकर आफत मोल ले ली। गत वर्ष पंद्रह जुलाई को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने दुष्कर्म के एक मामले में मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणी करके बसपा कार्यकरताओं के गुस्से को दावत दे दी। लोकसभा चुनावों के दौरान पीलीभीत से भाजपा के उम्मीदवार वरूण गांधी भी विवादों में घिरे। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि हिन्दुत्व की ओर बढ़ने वाला हाथ तोड़ दिया जाएगा। एक बार महिला आरक्षण्ा के संबंध में मुलायम ने कहा कि आरक्षण लागू हो जाने से बड़े बड़े घरों की लड़कियां राजनीति में आएंगी जिन्हें लड़के देख कर सिटी बजाएंगे। कुल मिलाकर नेताओं में किसी को यह मुंह नहीं है कि वह दूसरों को बुरा कहें जिसे जब अवसर मिलता है गाली बोल देते हैं और जब बात बिगड़ती है तो यह कह कर मामला शांत करने की कोशिश करते हैं कि हमारा मकसद किसी का दिल दुखाना नहीं था। पहले जो काम अन्य नेता करते रहे हैं इस बार वह शरद यादव ने किया है। नए और युवा नेता जोश में कुछ गलत बोल जाऐ तो बात समझ में आती है मगर शरद यादव जैसा सीनियर नेता जब जनता को ही बीमार कह दे तो इस से देश में राजनीति के घटते स्तर का अंदाजा होता है।

शुक्रवार, अक्टूबर 29, 2010

लीव इन में रहने वाली महिला रखैल नहीं तो और क्या?


गत दिनों सुप्रीम कोर्ट ने लीव इन में रह रही महिलाओं के संबंध में एक अहम फैसला देते हुये कहा की अगर कोई पुरूष रखैल रखता है , जिसको वो गुज़ारे का खर्च देता है और मुख्य तौर पर यौन रिश्तों के लिए या नौकरानी की तरह रखता है तो यह शादी जैसा रिश्ता नहीं है। इस फैसले के बाद बहुत से लोगों को रखैल शब्द पर आपत्ति है। प्रख्यात वकील और अडिशनल सॉलीसिटर जनरल इंदिरा जय सिंह ने लिव-इन रिश्तों में रह रही महिलाओं के लिए ' रखैल ' शब्द के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है की फैसले में इस्तेमाल किया गया रखैल शब्द बेहद आपत्तिजनक है और इसे हटाए जाने की जरूरत है। जयसिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट 21वीं सदी में किसी महिला के लिए ' रखैल ' शब्द का इस्तेमाल आखिर कैसे कर सकता है? क्या कोई महिला यह कह सकती है कि उसने एक पुरुष को रखा है? 
यह सही है की कोई महिला यह नहीं कहेगी की उसने पुरूष रखा हुआ है मगर इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता की जिस प्रकार पुरूष महिला को बिना शादी के साथ में रखते हैं उसी प्रकार महिलायें भी पुरूष को बिना शादी के अपने साथ रखती हैं। अब इस के बाद एक अहम सवाल यह पैदा हो गया है और इस पर बहस की ज़रूरत है की ऐसी महिलाओं के लिए रखैल शब्द का प्रयोग उचित कियून नहीं है। यह अलग बात है की कानून के मुताबिक कोई भी बालिग लिव इन में रह सकता है या रह सकती है। मगर क्या भारत जैसे देश में इस रिश्तों को सही माना जाएगा या सही माना जाना चाहिए। कोई भी धर्म ऐसा नहीं हैं जिसमें बिना शादी के महिला और पुरूष को एक पति पत्नी की तरह रहने और शारीरिक संबंध बनाने की इजाज़त देता है। इस के बावजूद यदि कोई ऐसा करता है तो उसे बुरी नज़र से कियून नहीं देखा जाए। ऐसा नहीं हैं रखैल शब्द सिर्फ महिलाओं के लिए ही है यदि कोई पुरूष किसी महिला के साथ बिना शादी के रह रहा है और शारीरिक संबंध बना रहा है तो उसके लिए भी यही शब्द इस्तेमाल होना चाहिए। यह कहना की 21 वीं सदी में किसी महिला के लिए रखैल शब्द का इस्तेमाल सही नहीं है बेकार की बात है। यह 21 वीं सदी है, देश तरक़्क़ी कर रहा है, महिलायें भी जीवन के विभिन्न मैदानों में आगे बढ़ रही हैं इसका मतलब यह नहीं है की वो बिना शादी के किसी पुरूष के साथ पति पत्नी की तरह रहें। ईमानदारी की बात यह है और सच्चाई भी इसी में है की जो कोई महिला या पुरूष इस तरह लीव इन में रहता है या रहती वो सिर्फ और सिर्फ ऐसा मज़े के लिए और जिम्मेदारियों से भागने के लिए करता है। इस प्रकार के रिश्तों में रहने वालों के लिए नैतिकता की बात करना बेमानी है। यह इंसान की फितरत है और इस लिए एक लड़का और लड़की में पियार मुमकिन है ऐसे में यदि उन दोनों को साथ रहना है और दोनों बालिग हैं तो फिर उनके लिए शादी एक बेहतरीन तरीका है। ऐसे लड़के या लड़कियां शादी जैसे पवित्र बंधन में बांधने से कियून भागते है। अगर कोई शादी से भागता है तो इसका मतलब यह है की शादी के बाद आने वाली जिम्मेदारियों से भाग रहा है। और जो लोग समाज से भागते हों , सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों से भागते हों ऐसे लोगों के साथ हमदर्दी किस बात की। एक आसान सी बात है जो हर किसी को समझना चाहिए की बिना शादी के शारीरिक संबंध बनाना ग़लत है और इसे ग़लत माना जाना चाहिए। जब बिना शादी के शारीरिक संबंध बनाने को ग़लत माना जाता है तो फिर लीव ईन में रहने और हर प्रकार के मज़े करने की जितनी भी निंदा की जाये कम है। जो लोग इस प्रकार के रिश्ता रखने वालों का साथ देते हैं, उनके साथ हमदर्दी रखते हैं और उनके हक़ की लड़ाई लड़ते हैं वो दरअसल भारत की संस्कृति के साथ मज़ाक करते हैं। मेरी जितनी समझ है उस से मुझे लगता है की लीव इन वेस्टर्न मुल्कों में फैली एक बुराई है जो अब बड़ी तेज़ी से भारत में भी फैलती जा रही है यदि ऐसे रिश्तों की निंदा नहीं की गयी तो धीरे धीरे शादी का सिस्टम ही खत्म हो जाएगा और पार्टनर बादल बदल कर मज़ा बदलने का रिवाज भी बढ्ने लगेगा.

शनिवार, अक्टूबर 23, 2010

खेल के बाद अब दूसरा खेल शुरू


पहले समय पर स्टेडियम तैयार नहीं हुये, फिर जो स्टेडियम तैयार हुये उन में कई कमियाँ रह गईं, किसी के छत से पानी टपका तो कहीं से साँप निकला, कहीं पुल टूट गया तो कहीं प्रैक्टिस के दौरान खिलाड़ी गिर कर ज़ख्मी हो गए। इन सब से बड़ी बात यह हुई कि जैसे-जैसे राष्ट्रमंडल खेलों के दिन नजदीक आते गए वैसे वैसे नए नए घोटाले भी सामने आने लगे। रही सही कसर दिल्ली में फैले डेंगू ने पूरी कर दी। इन सब के बाद हर कोई बस यही कहने लगा कि भारत में राष्ट्रमंडल खेल सही ढंग से नहीं हो पाएंगे और भारत की नाक कट जाएगी। मगर राष्ट्रमंडल खेलों का शानदार उद्घाटन हुआ और फिर शानदार समापन भी। इस दौरान सभी खेल शानदार तरीके से आयोजित हुये। हर कोई जो सुरेश कलमाड़ी और उनकी टीम के पीछे पड़ा हुआ था उसने भी कहा वाह! ऑस्ट्रेलिया जैसा देश जो पहले तो इस गेम में शरीक होने के बहाने बनाता रहा फिर वहाँ के एक पत्रकार ने स्टिंग ओपराशन करके भारत और दिल्ली को बदनाम करने की कोशिश की उसी ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी और मीडिया अब कलमाड़ी और उनकी टीम की तारीफ करते नहीं थक रहें हैं। ईमानदारी से देखा जाए तो राशत्रमंडल खेल जीतने सफल रहे उतने की किसी ने उम्मीद नहीं की थी।
कुल मिलकर खुदा का शुक्र है कि खेल बड़ी कामयाबी के साथ सम्पन्न हो गए। मगर अब इस खेल के समापन के बाद दूसरा खेल शुरू हो गया है। और यह खेल है एक दूसरे को बदनाम करने का खेल। गेम के तुरंत बाद पहले तो इस की सफलता का क्रेडिट लेने का खेल शुरू हुआ। आयोजन समिति के सुरेश कलमाड़ी ने कहा कि इसकी सफलता का सेहरा मेरे सर जाता है तो दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा कि यह कलमाड़ी के बस की बात नहीं थी, यह कमाल तो मैंने कर दिखाया। मगर जब मीडिया और आम जनता ने यह कहा कि ठीक है खेल तो सफल हो ही गए, अब ज़रा खेल के नाम पर किए गए घोटालों की जांच हो जाए तो फिर एक नया खेल शुरू हो गया और यह खेल है एक दूसरे को बदनाम करने का खेल। एक तरफ जहां दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित इन सारी अनियमितताओं के लिए कलमाड़ी और उनके लोगों को जिम्मेदार बता रहीं है वहीं दिल्ली सरकार की बेचैनी को देख कर लगता है कि आने वाला दिन उसके लिए भी अच्छा नहीं रहेगा। कलमाड़ी ने भी कहा है कि पहले दिल्ली सरकार अपनी योजनाओं में फैले भ्रष्टाचार की तरफ ध्‍यान दे फिर हमें बदनाम करने का सोचे। खुद शीला को भी लगता है कि दिल्ली सरकार को परेशानी का सामना करना पर सकता है इसलिए कैबिनेट की बैठक में शीला ने अपने मंत्रियों से कहा है कि राष्ट्रमंडल खेल परियाजनाओं से संबंधित जो भी काग़ज़ात हैं उसे संभाल कर रखें। शीला और कलमाड़ी के बीच शुरू हुई जंग से लगता है कि कहीं न कहीं दोनों को दाल में कुछ काला होने का डर साता रहा है। इसी कारण दोनों ने खुद को बचाने के लिए एक दूसरे को घेरना शुरू कर दिया है। इन दोनों को समझना चाहिए कि अगर आप इन खेलों की सफलता का सेहरा खुद के सर लेना चाह रहें हैं तो इस में यदि कोई गड़बड़ी हुई है तो इसकी ज़िम्मेदारी भी आपको ही लेनी होगी। वो तो कुछ दिनों में पता ही चल जाएगा कि इन सारे घपलों और घोटालों का असली जिम्मेदार कौन है मगर इस पूरे मामले में काँग्रेस पार्टी की भी किरकिरी हो रही है। और इसे मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी भी अच्छी तरह महसूस कर रहें है। यही कारण है कि सरकार के अलावा काँग्रेस पार्टी की तरफ से भी कलमाड़ी और शील दोनों से कहा गया है कि दोनों अपनी अपनी ज़बान बंद रखें और जांच में सहयोग करें ताकि काँग्रेस पार्टी की कोई बदनामी नहीं हो। मगर चूंकि खेल के बाद एक दूसरा खेल शुरू हो गया है और इस का लाभ हर पार्टी उठाना चाहती है तो भला भारतीय जनता पार्टी इस में कैसे पीछे रहती। भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी तो इन सारे घपलों और घोटालों के लिए परधानमंत्री दफ्तर को ही जिम्मेदार मानते हैं। गडकरी के अनुसार सारे भ्रष्टाचार के लिए अकेले आयोजन समिति नहीं बल्कि दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार भी ज़िम्मेदार है। कुल मिलकर पहले तो खेल के नाम पर अंदर अंदर दूसरा खेल भी होता रहा और अब जब की भ्रष्टाचार की जांच शुरू हुई है तो अब एक अलग ही खेल शुरू हो गया है और और वो है एक दूसरे को बदनाम कर खुद को बचाने का खेल और इस पूरे मामले का राजनीतिक लाभ उठाने का खेल। अब देखना यह है कि इस घटिया खेल में जीत किसकी होती है और हार किसकी होती है?

बुधवार, अक्टूबर 06, 2010

बिग बॉस की ऐसी की तैसी


 
बिग बॉस का चौथा सीजन धमाकेदार तरीके से शुरू हो चुका है। जैसा की समझा जा रहा था और यही इसमें ज़रूरी भी है बिग बॉस शुरू होते ही घर के अंदर धूम धमाका शुरू हो चुका है। एक दूसरे के भेद खुलने लगे हैं। नकली आँसू के गिरने का सिलसिला शुरू हो चुका है। और गली गलोज भी जारी है। इस बार सबसे अलग बात यह रही की पहले मेहमान आपस में एक दूसरे को गाली देते थे इस बार बंटी नाम के एक मेहमान ने किसी दूसरे मेहमान को नहीं बल्कि बिग बॉस को ही गाली दे दिया। बंटी ने बिग बॉस को एक दो नहीं बल्कि पचास बार गाली दी। यही कारण से उन्हें घर से बाहर भी कर दिया गया। यह वही बंटी हैं जो पहले बहुत मशहूर चोर थे अब जेल से बाहर आयें हैं तो मीडिया उन्हें हेरो बना कर पेश कर रही है और वो खुद भी अपने को किसी हेरो से कम नहीं समझ रहे हैं। बहुत से लोगों को लगता होगा की बंटी ने जो किया वो ग़लत है ऐसे लोगों को शायद यह पता नहीं की चैनल के लिए और इस प्रोग्राम् की सफलता के लिए जो चीज़ सब से ज़रूरी है वो बंटी ने ही किया। बिग बॉस जैसे प्रोग्राम्म का मतलब ही है की अंदर लोग एक दूसरे की बुराई करें एक दूसरे की मान बहन करें और जितना मुमकिन हो नकली आँसू बहाएँ। इस बार जो भी मेहमान बिग बॉस के घर में है उनमें कोई बड़ा नाम नहीं है। फिर जनता इतनी बेवकूफ तो है नहीं जो उन्हें देखना पसंद करेगी। हाँ इन्हें पसंद तब किया जाएगा जब इनमें मार पीट हो। वो एक दूसरे को गाली दें लड़के लड़कियों के बीच प्यार भी शुरू हो तभी तो जनता को अच्छा लगेगा। इस बार जो मेहमान आए हैं उनमें अधिकतर का बॅक ग्राउंड विवादित रहा है। जनता को वीणा मालिक को देखने में दिलचस्पी नहीं है बल्कि जनता तो चाहती है की वो पाकिस्तानी क्रिकेटर मोहम्मद आसिफ से अपनी प्रेम कहानी को जनता को बताए। अश्मित पटेल से लोग यह जानना चाहते है की कैसे उनका और रिया सेन का एम एम एस बना था। कुल मिला कर बिग बॉस जैसा प्रोग्राम गाली ग्लोज के बिना बेकार है। जनता में सर्वे करा कर देख लिया जाये बंटी ने जो बिग बॉस को गाली दी उसे पसंद किया गया होगा।
सच्चाई यह है की भारतिए मीडिया अब बहुत आगे निकाल चुका है। अब यहाँ भी शर्म नाम की कोई चीज़ नहीं रही। इस बार तो लड़के लड़की दोनों को बिग बॉस के एक ही कमरे में सुलाया जा रहा है। पहले दिन राखी सावंत का वो वाक्य याद कीजिये जब उसने सलमान खान से कहा था की इस बार लड़के लड़की साथ सोएँगे बड़ा मज़ा आएगा। जी हाँ इस बार जैसे जैसे मेहमान है तो तैयार रहिए बहुत अच्छी अच्छी चीज़ें देखने को मिलेंगी। हो सकता है दो मेहमान आने वाले दिनों में एक दूसरे को कीसस करते हुये भी नज़र आ जाएँ। ताज्जुब की बात यह है की भारत जैसे देश में इसे पसंद किया जा रहा है और दर्शक इसे खूब मज़े ले के देख रहें हैं। अब तो बिग बॉस की माँ बहन हो ही चुकी है आगे आगे देखिये होता है क्या.

गुरुवार, सितंबर 16, 2010

डील के बाद बाबरी मस्जिद हिंदुओं को सौंप दी जाएगी !


इन दिनों राज्यसभा के सांसद मोहम्मद अदीब और उर्दू अखबार सहाफ़त के रिश्ते कुछ ज्यादा ही खराब हो गए लगते हैं। वैसे तो इन दोनों के रिश्ते पहले भी अच्छे नहीं रहें हैं, मगर इस बार रिश्ते और अधिक खराब होने की वजह सहाफ़त में प्रकाशित एक खबर है। जिसमें कहा गया है कि मोहम्मद अदीब उन कुछ मुसलमान नेताओं में शामिल हैं, जो अंदर-अंदर एक प्लान तैयार कर रहें हैं कि अगर बाबरी मस्जिद का फैसला मुसलमानों के फ़ेवर में आ जाये तो भी विवादित ज़मीन को देश में राष्ट्रीय एकता के लिए हिंदुओं को दे दी जाये। कुछ इस तरह कि लीजिये हम खुशी खुशी यह ज़मीन आपको दे रहें हैं आप वहाँ मंदिर बना लीजिये।

सहाफ़त में 6 सितम्बर को पहले पेज पर इस संबंध में जो खबर छपी है, उसकी सुर्खी कुछ ऐसी है- सोनिया के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल को गुमराह करने की साजिशबाबरी मस्जिद की ज़मीन को राम मंदिर के लिए देने की तैयारी तेज़ : सलमाम खुर्शीद और मोहम्मद अदीब पेश : शंकराचार्य और उलेमा संपर्क में। अंदर खबर में जो लिखा है उसके अनुसार सलमान खुर्शीद और मोहम्मद अदीब की अगुआई में एक ऐसा आंदोलन चलाया जा रहा है, जिसके तहत बाबरी मस्जिद की जगह को राम मंदिर के लिए देने पर उलेमा से संपर्क किया जा रहा है। खबर के अनुसार एक प्रमुख सवाल के उत्तर में अदीब ने कहा कि जहां तक बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर को देने का सवाल है, तो इसके लिए मुस्लिम विद्वान, उलेमा और धर्माचार्यों से बात हो रही है।

खबर के छापने के लगभग एक सप्ताह बाद अदीब ने सहाफ़त को नोटिस भेजा है। कारवाई के लिए पुलिस से शिकायत की है और हरजाना भी मांगा हैं। मोहम्मद अदीब ने सहाफ़त की खबर को ग़लत बताते हुए 14 सितम्बर को जो खबर छपवाई है, उसके अनुसार- गत दिनों बाबरी मस्जिद के सिलसिले में मेरा जो बयान सहाफ़त में प्रकाशित हुआ, वो ग़लत और बेबुनयाद है। उनका यह भी कहना है कि इस इशू पर अखबार के किसी रिपोर्टर ने उनसे बात ही नहीं की। अदीब साहब ने यह भी लिखा है कि सहाफ़त अखबार पिछले एक साल से उनके पीछे पड़ा हुआ है और कई बार उन से संबंधित झूठी खबरें प्रकाशित करता रहा है। अदीब साहब के अनुसार अब वो इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अखबार के खिलाफ कार्रवाई करें।
इस खबर के एक दिन बाद सहाफ़त ने पहले पेज पर एक खबर प्रकाशित की। जिसकी सुर्खी है- मोहम्मद अदीब के आरोप पूरी तरह से बे-बुनियाद। अखबार ने खबर में लिखा है कि अदीब से संबंधित जो खबर हमने प्रकाशित की थी वो पूरी तरह से सही है। रही बात अदीब साहब की तो उनको संसद तक पहुंचाने में सहाफ़त ने बड़ी मदद की, इसके बावजूद पता नहीं क्यूँ वो एक साल से अखबार को बदनाम करने में लगे हैं। जहां तक खबर का संबंध है तो बाबरी मस्जिद के सिलसिले में इस तरह की गुपचुप तैयारियों की खबर हिन्दी अखबार नई दुनिया में 27 अगस्त को और लखनऊ के प्रतिदिन में भी छपी है।

अब सवाल यह है कि क्या सही में ऐसी कोई तैयारी चल रही है कि बाबरी मस्जिद का फैसला मुसलमानों के फ़ेवर में आ जाये तो भी विवादित ज़मीन राम मंदिर के लिए हिंदुओं को दे दी जाये। अगर ऐसी कोई तैयारी हो रही है तो फिर इसकी इजाज़त इन दो चार मुसलमानों को किसने दी। क्या हिंदुस्तान के दस-बीस करोड़ मुसलमानों की ज़िम्मेदारी इन्हीं दो-चार मुसलमानों पर है। अगर भारत के लगभग 99.9 प्रतिशत मुसलमानों को इसकी जानकारी नहीं है तो क्या यह कुछ गिने-चुने मुसलमानों का पूरे भारत के मुसलमानों के साथ धोखा नहीं हैं। इसकी भी गारंटी कौन देगा कि यह सब आपसी एकता के लिए हो रहा है या इस सिलसिले में कोई बड़ी डील हो रही है। हर सच्चा मुसलमान और सच्चा भारतीय चाहता है कि देश में एकता बनी रहे और दोनों धर्मों के लोग फालतू के किसी विवाद में न पड़ें। मगर क्या आम मुसलमानों को बताए बिना इस प्रकार की कोई डील करना उचित है। जहां तक अदीब साहब का सवाल है तो अगर उन्हें लगा कि सहाफ़त ने उनसे संबंधित ग़लत खबर छपी है तो उन्होंने इस खबर को ग़लत बताने में इतनी देर क्यूँ की। उन्हें चाहिए की वो इस सिलसिले में पूरे भारत के मुसलमानों को सच्चाई से अवगत कराएं।

रविवार, सितंबर 05, 2010

नाक कटने का डर


जैसे जैसे कॉमन वेल्थ गेम के दिन करीब आते जा रहे हैं वैसे वैसे दिल कि धड़कन यह सोच कर बढती जा रही है कि कहीं सचमुच इसका बेडा ग़र्क न हो जाए और कहीं दुनिया भर में हमारी नाक कट न जाए। आम जनता तो कह ही रही थी अब खिलाडी भी कहने लगे हैं कि हमारे देश को इतने बड़े खेल मेले के आयोजन कि जिम्मदारी नहीं लेनी चाहिए थी। एक तो इसकी तैय्यारी देर से शुरू हुई। दुसरे इसमें बड़े पैमाने पर घोटाला हुआ और अब रही सही कसार दिल्ली में फैले डेंगू ने पूरी कर दी है। भारत में होने वाली आतंकवादी घटनाओं से चिंतित विदेशी खिलाडी पहले ही भारत में आने से आना कानी करते रहे हैं अब कई खिलाडिओं ने डेंगू कि वजह से दिल्ली नहीं आने का फैसला किया है।
जहाँ तक तैय्यारी का सवाल है तो हर प्रकार कि तैय्यारी में देरी हुई। स्टेडियम देर से तैयार हुए। जिसे तैयार बता कर उसका उदघाटनकर दिया गया उसमें अभी भी कई कमियाँ हैं। जब दिल्ली में ज़ोरदार बारिश होती है तो सड़कों कि हालत तो खराब होती ही है स्टेडियम कि छतें भी टपकने लगती हैं। ताज्जुब कि बात तो यह है कि उन स्टेडियम कि छतें टपक रही हैं जिन्हें वर्ल्ड क्लास का बताया गया है। मीडिया को नसीहत कि जा रही है कि कृपा करके बदनाम करने वाली रिपोर्टिंग न करें मगर जब कमी है तो उसे लिखा कियूं नहीं जाए। झूठी शान कियूं दिखाई जाए। बहुत से लोग तो यह भी कह रहे हैं कि सुरेश कलमाड़ी एंड कंपनी का जो घोटाला सामने आ रहा है फिलहाल उस पर ध्यान नहीं दिया पहले खेल का आयोजन सफलता से होने दिया जाए फिर बात मरीं देखा जायेगा। किया यह संभव है कि कलमाड़ी और उनके चाहीतों को विभिन्न घोटालों के लिए गेम के बाद सजा मिलेगी। आई पी एल के कमिश्नर ललित मोदी पर जब आरोप लगे तो उन्हें फ़ौरन उनके पद से हटा दिया गया और अब उन्हें सजा दिलान्ने कि भी कोशिश हो रही है मगर पता नहीं कियों कलमाड़ी को बचाने वालों कि एक लम्बी लाइन लगी हुई है। मनमोहन सिंह, शीला दीक्षित , एम् एस गिल और कई दुसरे लोगों कि तरह हर भारतीय यही चाहता है कि इन खेलों का आयोजन सही तरह से हो जाये और भारत कि नाक नहीं कटे मगर अब तक जो कुछ देखने में आ रहा है उस से यही लग रहा है कि नाक कटने का डर बना हुआ है।

शनिवार, अगस्त 07, 2010

सरकार के वीरुध एकजुट हुए उर्दू समाचार पत्र

हिन्दी और अंग्रेज़ी के समाचार पत्रों की तरह उर्दू के समाचार पत्रों में भी आपस में काफी मुकाबला देखने को मिलता है। अंतर सिर्फ इतना है की एक ओर जहां हिन्दी और अंग्रेज़ी के समाचारपत्र खबरों के लिए मुकाबला करते हैं वहीं उर्दू के अखबार सिर्फ इस बात के लिए एक दूसरे से मुकाबला करते हैं की अधिक से अधिक मंत्रियों से कैसे जान पहचान बनाई जाए और कैसे ड़ी ए वी पी में बड़े अधिकारियों से मिलकर अधिक से अधिक विज्ञापन हासिल किया जाए। उर्दू अखबारों में यह भी एक चलन है की यहाँ हर अखबार बड़े बड़े मुस्लिम विद्दुयानों को अपने करीब रखने की कोशिश करता है। मगर इस बार उर्दू अखबार वालों को एक ऐसी परीशनी का सामना है की सब के सब सरकार के वीरुध एकजुट नज़र आ रहें हैं। हुआ यह है की पिछले कुछ महीनों से उर्दू अखबार को ड़ी ए वी पी के विज्ञापन बहुत कम मिल रहें हैं। और जहां तक उर्दू अखबारों का सवाल है तो उर्दू अखबार की आम्दनी का जरिया बहुत हद तक ड़ी ए वी पी के विज्ञापन ही होते हैं। मगर ऐसा देखा जा रहा है की यू पी ए सरकार पता नहीं क्यूँ उर्दू वालों को विज्ञापन नहीं के बराबर दे है। हद तो यह है की जो विज्ञापन सिर्फ उर्दू वालों के लिए होते हैं वो भी इंग्लिश अखबारों में छपते हैं। अब चूंकि इंग्लिश या हिन्दी अखबारों की तरह उर्दू मैं न तो ब्लाक मेल करने का चलन है और न ही इन में प्राइवेट विज्ञापन ज्यादाह होते हैं इस लिए उर्दू अखबार के बचे रहने के लिए ड़ी ए वी पी विज्ञापन ज़रूरी है। मगर यू पी ए सरकार उर्दू अखबार के साथ सौतेला रवैया अपना रही है। सरकार की इसी बेरुखी से नाराज़ होकर उर्दू अखबार के संपादकों और मालिकों ने प्रधान मंत्री और दूसरे मंत्रियों से मिलने का सिलसिला शुरू कर दिया है। गत दिनों इसी सिलसिले में हिंदुस्तान एक्सप्रेस के परवेज़ सुहाइब अहमद, हमारा समाज के खालिद अनवर, सहाफ़त के हसन शुजा और अखबार मशरिक़ के वसीमूल हक़ ने मौलाना अर्शद मद्नी और सांसद बदरुद्दीन अजमल के साथ प्रधान मंत्री से मुलाकात की। प्रधान मंत्री हालांकि इस टीम को आश्वासन दिया की वो उर्दू अखबारों की समस्याओं पर ग़ौर करेंगे। उनहों ने अपने प्रैस सलाहकार से भी कहा की इन अखबारों के समस्याओं को हल करने की कोशिश करें। इस पर अमल कब होता है यह तो बाद में पता चलेगा।
चूंकि सरकारी विज्ञापन नहीं मिलना एक बड़ी समस्या है इस लिए इस सिलसिले में उर्दू अखबार के संपादकों ने मंत्रियों और ऐसे लोगों से मिलना शुरू कर दीया है जिनसे कोई लाभ हो सकता है। वैसे तो उर्दू अखबार की मदद के लिए मौलना लोग और कई सांसद भी सामने आ गए हैं मगर कई लोग ऐसे भी हैं जिंका कहना है की अखबार वाले क्या अपनी समस्या खुद हल नहीं कर सकते जो उन्हें मौलाना लोगों की मदद लेनी पड रही है। इस सिलसिले में जिन लोगों ने खुलकर उर्दू वालों की मदद करने का वादा किया है और कर भी रहें हैं उनमें सांसद मोहम्मद अदीब, मौलाना अहमद बुखारी, मौलाना अर्शद मदनी और मौलाना वाली रहमनी का नाम उललेखनिए है। इन सभी का यही कहना है और यह सही भी कह रहें हैं की सरकार उर्दू अखबार के साथ नाइंसाफी कर रही है। गत दिनों दिल्ली में एक प्रोग्राम के दौरान सांसद मोहम्मद अदीब ने कहा की उर्दू वालों के साथ सब से बड़ा मसला यह है की उनका कोई संगठन नहीं है जो उनके लिए आवाज़ बुलंद कर सके। इसी प्रोग्राम में कोलकाता के मशहूर अखबार आज़ाद हिन्द के संपादक और सांसद सईद मलीहाबादि ने कहा की हर अखबार अकेले अपनी समस्या हल नहीं कर सकता। इस के लिए ज़रूरी है की संगठन बनाया जाए और फिर किसी समस्या के हल के लिए मिलकर कोशिश की जाये. कुल मिला कर पहली बार ऐसा देखने में आ रहा है की उर्दू के सभी अखबार वाले एक प्लातेफ़ोर्म पर आ गए हैं और सब मिलकर इस समस्या का हल निकालने की कोशिश में लगे हैं। मगर बड़े अफसोस की बात यह है की राजनीती यहाँ भी हो रही है। एक ओर जहां हर कोई इस अवसर का लाभ उठा कर अपनी अधिक से अधिक पहुँच नेताओं तक बनाने की कोशिश में लगा है वहीं उर्दू के एक बड़े अखबार राष्ट्रीय सहारा के संपादक अज़ीज़ बर्नी ने खुद को इस पूरे मामले से अलग रखा हुआ है। जिस पार्कर चुनाओ के समय मुसलमानों का वोट बाँट जाता है ठीक उसी तरह यहाँ भी थोड़ी बहुत राजनीती हो रही है और उर्दू वाले एक दूसरे को काटने में लगे हुये हैं। इस अवसर पर यदि सबने मिल कर काम नहीं किया तो इसका एक बड़ा नुकसान आने वाले दिनों में सब को होगा। पता नहीं यह बात उर्दू अखबारों के संपादकों या मालिकों को क्यूँ समझ में नहीं आ रही है। सुनने में यह भी आ रहा है की सरकार को कुछ उर्दू के संपादकों ने चार पाँच नाम दे कर यह कहा है की यही चार पाँच अखबार उर्दू के दिल्ली से निकलते हैं बाक़ी नहीं। इस के बाद से उन अखबारों में नाराज़गी पायी जा रही है जिसका नाम इस लिस्ट में नहीं है।

शुक्रवार, जुलाई 09, 2010

नितीश कुमार का रिपोर्ट कार्ड और असलियत

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी सरकार के पांचवे वर्ष में राज्य सरकार के क्रियाकलापों को लेकर एक रिपोर्ट कार्ड जारी किया है। जिसमें उन्हीं ने एक तरफ जहाँ यह बताने की कोशिश की है हमने पिछले चार सालों में क्या क्या कमाल क्या है वहीं उन्हों ने उर्दू और सिंस्कृत के टीचरों की नियुक्ति की बात भी काही है। जहाँ तक उनके 112 पृष्ठ के रिपोर्ट कार्ड का सवाल है तो वो यदि यह रिपोर्ट कार्ड नहीं भी जारी करते तो जनता को पता है की वो कुछ अच्छा काम कर रहें हैं मगर सच्चाई यह है की रिपोर्ट कार्ड की पूरी बात सही नहीं है। इस में शक नहीं की नितीश के आने के बाद बिहार की हालत बेहतर हुई है मगर इसका फाइदा सिर्फ उन्हीं लोगों को मिल रहा है जो तेज़ और चालाक हैं और जो नेताओं की चमचागीरी में लगे रहते हैं। इसकी कई मिसालें दी जा सकती हैं। उदाहरण के तौर पर बिहार में ज्यादाह तर गाँव में यह देखा गया है की बी पी एल में अमीरों का नाम है और ग़रीब बेचारे इसका लाभ नहीं ले पा रहें हैं। उसी प्रकार इन्दिरा आवास योजना का लाभ जरूरतमंदों को नहीं मिल रहा है। इन्दिरा आवास के तहत जितनी रकम टाई है उस से 5-10 हज़ार कम रकम मिलती है। बकी की रकम कई लोग रिश्वत के तौर पर लेते हैं। इनमें गाँव के छोटे मोटे दलाल मुखिया और ब्लॉक विकास अधिकारी भी शामिल रहता है.सिक्षा मित्रों को तनख्वाह तो मिल रही है मगर वो पाबंदी से स्कूल नहीं जाते और वो बच्चों को पढ़ाने के योग्य भी नहीं हैं। सिक्षा मित्रों की हालत यह है की उन्हें अपना पैसा लेने के लिए मुखिया को रिश्वत देनी पड़ती है। मुखिया के खिलाफ कोई सिक्षा मित्रा इस लिए नहीं बोलता की उसे पता है की मैं भी तो दूसरे का हक मार कर बे इमानी से टीचर बना हूँ। स्कूलों में चार्ट तो लगा है की फलां दिन फलां खाना बनेगा मगर कई कई दिन तक खाना नहीं बनाता। कुल मिलकर नितीश जी बहुत कुछ बेहतर करने की कोशिश की है मगर अफसरों की बे इमानी से ज़रूरतमंद इसका लाभ नहीं उठा पा रहें हैं। 
जहाँ तक 27 हजार उर्दू शिक्षक, की नियुक्ति का सवाल है तो यह तो नितीश जी ने चुनाओ को देखकर किया है.चुनाओ के कारण ही उन्हों ने कहा की वह चाहते हैं कि प्रत्येक विद्यालय में एक उर्दू शिक्षक हो। कुल मिलकर नितीश काम अच्छा कहा जा सकता है मगर इस से इंकार नहीं किया जा सकता की उनकी जो योजनाएं हैं उसका लाभ सही लोग नहीं उठा पा रहें हैं। जहाँ तक अफसरों की बे इमानी का सवाल है तो वो अब भी उतने ही बे ईमान हैं जीतने लालू प्रसाद के ज़माने में थे.