मंगलवार, जनवरी 12, 2010

राजनेता को जनता की चिंता नहीं

गत सप्ताह दो ऐसी घटनाएं हुईं जिस से यह आसानी से अंदाज़ा लग जाता है कि नेताओं को जनता कि कोई चिंता नहीं है। वह राजनीती में सिर्फ और सिर्फ अपना भला करने के लिए आते हैं। पहली घटना दक्षिण भारत कि है वहां एक पुलिस वाला बम का शिकार हो कर तड़प तड़प कर सड़क पर मरता रहा मगर वहां से गुजरने वाले नेताओं ने उसकी चिंता नहीं की और उसे उसके हाल पर छोड़ दिया। बाद में इस पुलिस वाले की मौत हो गयी। ज्ञात रहे कि यह वह पुलिस वाला था जो चन्दन तस्कर वीरप्पन को मारने वाली टीम का हिस्सा था। जब नेता ने एक बड़े पुलिस वाले कि सुध लेने कि कोशिश नहीं कि तो फिर एक आम जनता यह कैसे आशा कर सकती है कि जिस व्यक्ति को उस ने अपना कीमती वोट देकर दिलाया है वह परीशानी में आपका साथ देगा। ऐसे लोग आपका साथ कभी नहीं दे सकते।
उसी तरह इन दिनों महंगाई ने जनता का जीना हराम किया हुआ है। इस सिलसिले में जब पत्रकारों ने कृषि मंत्री शरद पवार ने पूछा कि महंगाई कब कम होगी तो उनका कहना था कि मैं ज्योतिषी नहीं हूँ जो यह जानूं। ज़रा सोचिये जब मंत्री को यह पता नहीं होगा तो यह किसे पता होगा। मंत्री जी तो कौन बताये कि मामूली सी महंगाई से आम जनता को परीशानी हो जाती है और अभी तो बेतहाशा महंगाई बढ़ रही है। आम जनता के घर का पूरा सिस्टम ही गड़बड़ हो गया है। ऐसे में मंत्री का ग़ैर जिम्मेदाराना बयान क्या साबित करता है। सच्चाई यह है कि आज राजनीती में ज्यादह तर ऐसे ही लोग हैं जिन्हें जनता कि फ़िक्र नहीं है वह राजनीती में हैं टी सिर्फ इसलिए कि इस दौरान अधिक से अधिक पैसे बना लिए जाएँ ताकि आने वाली नस्ल आराम से जीवन गुज़ार सके.

गुरुवार, दिसंबर 17, 2009

धंधा है पर गन्दा है.

गत दिनों सुप्रीम कोर्ट की एक ऐसी दलील आई जिसे भारतीय समाज में आसानी से स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि दुनिया के सब से पुराने धंधे वैश्यावृति पर अगर कानून बनाकर या फिर किसी और तरीके से रोक लगाना मुमकिन नहीं हो रहा है तो फिर इसे कानूनी दर्जा ही क्यों न दे दिया जाये। कोर्ट कि यह टिपण्णी बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि हर तरह कि कोशिश के बावजूद इस बुराई पर काबू नहीं पाया जा सका है। अलबत्ता इस के अंदाज़ में भी तब्दीली आ गयी है। कुछ साल पहले तक यह गन्दा धंधा चोरी छुपे होता था मगर अब यह खुले आम हो रहा है। पहले दलाल लोगों को वेश्या के पास लाते थे अब बिंदास टाइप कि लड़कियां काल गर्ल का काम कर रही है और इस धंधे में वोह किसी दलाल के चक्कर में पड़ने के बजाये खुद ही अपना नंबर बाँट रही हैं और घंटों में लाखों पैसा कमा रही हैं। जी हाँ अंग्रेज़ी अखबार में मसाज सेण्टर के नाम पर जो विज्ञापन छपता है वोह असल में काल गर्ल का ही नंबर होता है। इन में कुछ तो दलाल के नंबर होते हैं और कुछ पर आप सीधा काल गर्ल से ही बात कर सकते हैं। इन काल गर्ल के चार्ज अलग अलग होते हैं। इन से होटल में संपर्क करें तो उसका चार्ज अलग होगा इन्हें आप जहाँ चाहें ले जायें उसका चार्ज अलग होगा। ऐसी लड़कियां भी हैं जो एक साथ कई लोगों के साथ जाने को तैयार हैं बस आपको उसका रेट देना होगा। कुल मिला कर दुनिया के दुसरे देशों कि तरह भारत में भी वैश्यावृति किसी न किसी शक्ल में मौजूद है।
अब सवाल यह है कि क्या यदि यह बुराई बड़े पैमाने पर हो रही है और इस पर रोक भी नहीं लग पा रहा है तो क्या इसे जायज़ करार दिया जाना उचित होगा। भारत जैसे देश में इसका सीधा सा जवाब यह है कि इस बुराई को किसी भी तरह से जायज़ नहीं ठाहराया जा सकता। इस से इनकार नहीं किया जा सकता कि बुराई भारत के छोटे बड़े हर शहर में मौजूद है। ग़रीब से ग़रीब और अमीर से अमीर लड़कियां इस बुराई में लिप्त हैं। मगर इस का मतलब यह नहीं है कि यदि बुराई बड़े पैमाने पर हो रही है तो उसे बुराई नहीं मन जाये। यदि इस बुराई को जायज़ ठाहराया जाता है तो इस का समाज पर बहुत बुडा असर पड़ेगा। जो वैश्याएँ या काल गर्ल आज कुछ हद तक शर्माती हैं वह फिर खुलेआम अपने ग्राहक से बदतमीजी करती नज़र आयेंगे। कुल मिलकर वैश्यावृति चाहे कितनी ही पुरानी तिजारत क्यों न हो यह एक बहुत बड़ी बुराई है और इसे भारतीय समाज में उचित नहीं ठाहराया जा सकता।

गुरुवार, नवंबर 26, 2009

अल्लाह करे ऐसा फिर कभी न हो


मुंबई में पर हुए आतंकवादी हमलों को एक साल बीत चुके हैं। इस अवसर पर आज हमें उन सभों के साथ होना चाहिए जिनके रिश्तेदार इस में मारे गए। इस आतंकवादी हमले में जिस किसी का भी हाथ था उसे जितनी भी सज़ा दी जाए कम होगी। आखिर इस तरह की दहशतगर्दी फैलाने वाले यह क्यों नहीं समझते कि उन्हों ने मासूम लोगों कि जान ले कर बहुत बुरा किया है। समझ में नहीं आता कि ऐसे लोग बेगुनाहों को मार कर आखिर क्या हासिल करना चाहते हैं। दुनिया का कोई भी धर्म बेगुनाहों कि जान लेने से मना करता है। जहाँ तक इस्लाम धर्म का सवाल है तो उसने तो एक व्यक्ति हत्या को पूरी मानवता कि हत्या बतलाया है। फिर तो एक सच्चा मुसलमान इस प्रकार कि गन्दी हरकत कर ही नहीं सकता।
जो लोग इस हमले में शामिल थे उसमें से अकेले अजमल कसाब ही बचा है। जो मर गए उन्हें ऐसा करके आखिर क्या मिला। अजमल कसाब भी किसी तरह बच नहीं सकता। तो फिर उसने ऐसा क्यों क्या। पता नहीं ऐसे लोग आख़िर क्या हासिल करना चाहते हैं। इस तरह कि हरकत जो भी कर रहा है उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता। हर किसी को इस पारकर के हरकतों कि निंदा करनी चाहिए यदि कोई ऐसा नहीं करता है तो उसे बस इतना समझना चाहिए आज इस हमले में किसी का बेटा, किसी का शौहर, और किसी का बाप मारा है कल ऐसा किसी उसके अपने के साथ भी हो सकता है। हम तो बस खुदा से यही दुआ करते हैं कि इस हमले में जो लोग मारे गए हैं खुदा उनके घर वालों को सब्र दे और ऐसा हमला न केवल हिन्दुस्तान में बल्कि दुनिया के किसी भी हिस्से में नहीं हो और इस तरह बेक़सूरों कि जान न जाए।

सोमवार, नवंबर 09, 2009

विधान सभा में राज ठाकरे एंड कंपनी की गुंडा गर्दी

महाराष्ट्र विधान सभा में अबू आसिम आज़मी के शपथ लेने के समय राज ठाकरे उनके निर्वाचित गुंडों ने जो कुछ भी किया उसकी जितनी भी निंदा की जाए कम हैआए दिन किसी किसी बात को बहाना बनाकर राज के गुंडे तो पहले भी लोगों के साथ मार पीट करते रहे हैं मगर इस बार तो उनहोंने हद ही कर दीहिन्दी में शपथ लेकर अबू आसिम आज़मी देशभक्ति का एक बेहतरीन नमूना पेश कर रहे थे मगर राज के गुंडों को देश की भाषा का महत्व ही नहीं मालूम इसलिए उन्हों ने आज़मी के साथ सदन के अन्दर ही बदतमीजी की
राज और उनके गुंडों की हिम्मत आज इसलिए बढ़ गई है की उन्हों ने पहले जब भी हंगामा किया , बड़े बड़े लोगों के साथ बदतमीजी की तो उन के विरूद्व करवाई नहीं हुईनॉर्थ इंडिया खास तौर पर बिहार के लोगों के साथ राज के गुंडे आए दिन मार पीट करते रहते हैं मगर कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकाराज और उनके लोग नंगे होकर सड़कों पर नाचते रहे और उन लोगों के ख़िलाफ़ कोई कारवाई नहीं हुई। सरकार और पुलिस की लापरवाही की वजह से ही आज राज के लोगों ने सदन में ही ऐसी हरकत कर दी की सारे देश की आँखें शर्म से झुक गयीं।
फिलहाल सदन में बदतमीजी करने वालों के खिलाफ करवाई हुई है मगर इन के अलावा राज ठाकरे के खिलाफ भी सख्त करवाई होनी चाहिए। ताज्जुब की बात यह है की जिस हरकत को सारा देश बुरा कह रहा है राज और उनके लोग हमेशा वही हरकत करते हैं। अगर राज ठाकरे पर लगाम नही लगाया गया तो आने वाले दिनों में वह और उनके लोग और भी अधिक खतरनाक हो जायेंगे और फिर इस की प्रतिकिर्या में पूरे देश में जो होगा उस पर काबू पाना आसन नहीं होगा।

शुक्रवार, अक्टूबर 30, 2009

आग बुझा नही पा रहे चलें हैं सुपर पॉवर बनने


भारत और पाकिस्तान के बीच जब भी तनाव पैदा होता है तो टेलिविज़न पर आने वाले रक्षा विशेषज्ञ यही कहते है की हमारे पास पाकिस्तान के मुकाबले बहुत ताक़त है अगर हमारा पाकिस्तान से झगडा हो गया तो उसे पूरी तरह से हमें एक महीना से ज्यादह नही लगेगा। हमारा देश भारत कितना मज़बूत है और भगवान् न करे हम पर कोई बड़ी कठिनाई आती है तो हम इस से निबटने के लिए कितने सक्षम हैं इसका अंदाजा हमें जयपुर के पास इंडियन आयल के डिपो में लगी खतरनाक आग के बाद हो गया जिसे कई घंटे बीतने के बाद भी बुझाया नही जा सका। अब प्रश्न यह उठता है की सुपर पॉवर बनने का खवाब देखने वाले हिंदुस्तान के पास ऐसा कोई सिस्टम नहीं है जिसकी सहायता से ऐसी आग पर काबू पाया जा सके।
दिल्ली , मुंबई, और मथुरा से माहिर बुलाये गए मगर सब के सब इस आग को बुझाने में लाचार साबित हुए। पेट्रोलियम मिनिस्टर , जयपुर के चीफ फाएर ऑफिसर और मथुरा के जो भी माहिर गए सब ने अपने हाथ खड़े कर दिए और यही कहा की इस आग पर काबू पाना हमारे बस का नहीं है। हम तो उस समय का इंतजार कर रहे हैं जब टैंक का पेट्रोल ख़ुद समाप्त हो जाएगा और फिर आग ख़त्म हो जायेगी। डिपो में लगी इस आग से लगभग २० लोग मारे गए , अरबों रूपये का नुकसान हुआ और हजारों लोगों को अपना घर बार छोड़ कर भागना पड़ा। मगर यह सब उतना अफसोसनाक नहीं है जितना अफ़सोसनाक यह है की हमारे पास ऐसे सिस्टम की कमी है जो इस तरह की मुसीबत आने पर इसका हल निकाल सके।
सच्चाई यह है की हमारे देश में किसी को अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास नहीं है। जयपुर में सिस्टम की खामी देखिये की जब मथुरा से गए सी आई एस ऍफ़ के लोग एक ख़ास केमिकल ले कर वहां पहुंचे तो उन्हें अपनी करवाई शुरू करने में इस लिए देर लगी क्योंकि उन्हें इस के लिए पानी की आवशयकता थी मगर उन्हें चार पाँच घंटे तक पानी नहीं मिला। वैसे बाद में इस टीम ने भी कह दिया की इस खतरनाक आग पर काबू पाना उनके बस का नहीं है। अब यह बात संजीदगी से सोचने की है की क्या इस नाकामी के बाद हम यह कहने की पोजीशन में हैं की हम ने काफ़ी तरक्की कर ली है और हम कई मुल्कों से टक्कर लेने की पोजीशन में हैं और यह की जल्द ही हम भी सुपर पॉवर बन जायेंगे। जहाँ तक मेरी समझ है जो देश ऐसी आग को बुझाने की सलाहियत नहीं रखता हो उसे ख़ुद को विकास शील देश कहने का हक भी नही है।

गुरुवार, अक्टूबर 22, 2009

कमाल खान का कमाल


अब तक जो खबरें आ रही हैं उसके मुताबिक अंततः देशद्रोही से मश्हूर हुए कमाल खान को गाली बोलने और घर वालों के साथ मारपीट करने पर बिग बॉस ने अपने घर से निकाल दिया। यह तो पहले दिन ही तै हो गया था की बिग बॉस के घर में रहने वाले बाकी लोग कमाल को पसंद नहीं करते हैं। मगर सच्चाई यह है की चैनल वाले और वह सब लोग जो इस प्रोग्राम को देखते हैं वह सब कमाल को ही पसंद करते थे और उनकी वजह से ही लोग मज़े भी ले रहे थे और चैनल की टी आर पी बढ़ गई थी।
यह सही है की कमाल ने कुछ ज्यादह ही बदतमीजी कर दी मगर सच्चाई यह है की इस तरह के प्रोग्राम में ऐसा ही होना चाहिए और यही हर कोई चाहता है। यदि कमाल की बात को छोड़ दें तो कौन सा मेहमान उस घर का शरीफ है। हर कोई एक दूसरे को गली दे रहा है और हर कोई एक दूसरे की बुरे कर रहा है। औरतों जैसी हरकत करने वाले रोहित वर्मा भी बिल्कुल औरतों की तरह ही जब देखो किसी न किसी की बुराई कर रहे हैं। अब जबकि कमाल खान इस घर से निकाले जा चुके है तो क्या अब वहां हंगामा नही होगा । और अगर हंगामा नहीं होगा तो फिर कौन इतना बेवकूफ है जो एक शराफत वाले प्रोग्राम को अपना कीमती वक्त ख़राब का के देखेगा ।
सही बात यह है की इस तरह के प्रोग्राम का आना ही ग़लत है। अंत में जीत जिसकी भी हो मगर इस दौरान कई लोगों में झगडा तो हो ही जाता है। घर में कमाल के बारे सब जैसी बातें कर रहे थे उस से तो यही लगता है की उन में से बिन्दु को छोड़ कर अब किसी से भी उसके रिश्ते बेहतर नही हो सकते। दुनिया भर में लोगों को हंसाने वाले राजू श्रीवास्तव जैसा शरीफ व्यक्ति भी कमाल से झगड़ गया और सब ने देखा की कमाल ने ज्यादह बदतमीजी की मगर गाली राजू ने भी दी। क्या अब कभी राजू और कमाल के रिश्ते बेहतर हो सकते हैं। मेरे हिसाब से तो ऐसा कभी नहीं हो सकता ।
कुल मिलाकर अगर आप भारत में ऐसा प्रोग्राम देखना चाहते है तो आप को बिग बॉस के घर में गली गलोज देखने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। बल्कि जनता तो गली गलोज ही देखना चाहती है और अगर ऐसा नहीं है तो फिर देख लेंगे की बिना मर पीट और गली गलोज के यह प्रोग्राम कैसे सफल होता है। कई लोगों ने कहा है की कमाल जो कर रहे थे वह ज्यादह हो गया मगर ऐसी हरकतें ही इस तरह के प्रोग्रामों को सफल बनाती हैं।

मंगलवार, अक्टूबर 20, 2009

सिब्बल साहब का यह फ़ैसला उचित नहीं

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने आई आई टी में कई तब्दीलियाँ करने की तरफ़ इशारा दिया है। उनकी कौन सी बात मणि जायेगी और कौन सी नहीं यह तो अलग सवाल है मगर उनका यह सुझाव किसी भी तरह से मानने के काबिल नहीं है की आई आई टी की प्रवेश परीक्षा में वही छात्र बैठ सकते हैं जिन्हों ने बारहवीं में ८० प्रतिशत नम्बर हासिल किए हों। इतने ज्यादह नम्बर सी बी एस ई के लड़के ही लाते हैं और दूसरे बोर्ड में इतने अधिक नम्बर लाना आसन नहीं है। वैसे तो इस फैसले को लागू नहीं होना चाहिए मगर अगर ऐसा हो जाता है तो सबसे ज्यादह नुकसान बिहार के स्टुडेंट का होगा। मैं ऐसे एक दो नही बल्कि कई स्टुडेंट को जानता हूँ जिन्हों ने मेट्रिक या बारहवीं में कोई बहुत अच्छा नहीं किया है मगर बाद में मेहनत करके वोह आई आई टी में सफल हुए। इसका मतलब यह हुआ की यह कोई ज़रूरी नही है की कोई लड़का यदि शुरू के दिनों में बेहतर नही है तो वोह बाद में भी अच्छा नही करेगा। सिबाल साहब अपने इस सुझाव को वापस ले लें तो बेहतर कोगा।

शनिवार, अक्टूबर 10, 2009

ओबामा को नोबेल


अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को शान्ति का नोबेल पुरस्कार देने का इलान किया गया है। दुनिया के और दूसरे पुरस्कारों की तरह अब नोबेल के बारे में भी ऐसा कहा जाने लगा है की अब इस पुरस्कार की भी कोई बहुत ज्यादह अहमियत नही रह गई है। ओबामा ही नही इस से पहले भी नोबेल इनाम खास तौर पर शान्ति का नोबेल ऐसे कई लोगों को मिल चुका है जिन्हों ने दुनिया में शान्ति फैलाने के बजाये फसाद फैलाया। जहाँ तक ओबामा का सवाल है तो सिर्फ़ अल काएदा या सिर्फ़ तालिबान वाले ही ओबामा को पुरस्कार देने को ग़लत नहीं मान रहे हैं बल्कि दुनिया में लाखों ऐसे लोग है हैं जिनकी नज़र में ओबाम अफगानिस्तान या फिर इराक में जो कर रहे हैं वोह सही नही है। दुनिया में अमेरिका की वजह से शान्ति है या फसाद इस से हर कोई अवगत है । ऐसा नही है की तालिबान या अल काएदा के लोग जो कर रहे हैं वोह सही है मगर ओबामा और उनके लोग जो कर रहें हैं वोह भी सही नही है। ओबामा ने अब तक जो किया है उसे देख कर ऐसा नही लगता की वोह इस इनाम के हकदार थे।

मंगलवार, सितंबर 22, 2009

शाबाश पुण्य प्रसून वाजपेयी


आम तौर मुसलमाओं में यह सोच पाई जाती है की मीडिया में उनकी सही तस्वीर पेश नही की जाती । ऐसा कुछ हद तक सही भी है मगर इस बात से इंकार नही क्या ज सकता की आज भी कई अख़बार , कई चैनल और पत्रकार ऐसे हैं जो किसी भी हालत में सच का दामन हाथ से नहीं छोड़ते हैं। ऐसे ही पत्रकारों में से एक है टेलिविज़न की दुनिया के जाने माने पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी। गत दिनों उन्हों ने स्वर्गीय इशरत जहाँ से यह कहते हुए माफ़ी मांगी की हमने इशरत से सम्बंधित उसकी हत्या के समय जो ख़बर चलायी थी वोह ग़लत थी। काश ऐसी सोच हर पत्रकार की होती। आज सच्चाई यह है की देश में ज्यादह तर पत्रकार बेईमान हैं। दूसरी ख़बरों के साथ तो वोह बेईमानी करते ही हैं मुसलमानों से सम्बंधित ख़बरों में तो बेईमानी से काम लिया ही जाता है । प्यारे देश भारत में जब भी कोई धमाका होता है बिना किसी जाँच के तुंरत यह ख़बर चला दी जाती है की इसके लिए मुस्लमान जिम्मेदार हैं। कोई यह जानने की कोशिश नहीं करता की पहले सच जान लें फिर खबर चलायी जाए।

देर से ही सही मगर अब वाजपेयी ने अपनी ग़लती मान कर इतना बड़ा काम किया है की उनकी जितनी भी तारीफ की जाई कम है। आज पत्रकार बड़ी बेशर्मी से सिर्फ़ पुलिस और दूसरी अजेंसिओं की बात मान कर झूट को सच साबित करने में लगे रहते हैं। जहाँ तक फर्जी एनकाउंटर का सवाल है तो यह बात अब साबित हो चुकी है की भारत में ज्यादह तर एनकाउंटर फर्जी होते हैं। एनकाउंटर में यदि कोई मुसलमान मारा जाए तब तो ऐसे एनकाउंटर पर और भी शक होता है।

मेरा बस इतना कहना है की हो सकता है कुछ धमाकों में मुसलामानों का भी हाथ हो मगर हर धमाके के बाद बिना किसी सबूत के मुसलामानों को बदनाम कर देना उचित नही है। इस बात का अहसास पत्रकार बंधुओं को भी होना चाहिए। यदि पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसी सोच हर पत्रकार की हो जाए तो फिर इस देश में कोई भी बेगुनाह मारा नही जाएगा और अगर मारा भी गया तो उसके कातिलों को सज़ा ज़रूर मिलेगी.

रविवार, सितंबर 20, 2009

ईद मुबारक


आज सारी दुनिया में ईद मनाई जा रही है । कल हमारे प्यारे देश भारत में भी ईद माने जायेगी । एक तरफ़ जहाँ ईद हमें खुशियाँ मानाने का मौक़ा देती है वहीँ हमें इस अवसर पर यह भी सोचना चाहिए की इस्लाम में जी कहा गया है हम उस पर चल रहे हैं की नहीं। इस अवसर पर हमें यह भी सीचना चाहिए की हम देश के कितने काम आ रहे हैं। आज पूरी दुन्या में मुसलमानों को बदनाम करने की एक साजिश चल रही है ऐसे में हमारी यह कोशिश होनी चाहिए की हम दुनिया के सामने इस्लाम की सही तस्वीर पेश करें। इस में कोई दो राए नहीं की कुछ लोगों की ग़लती से इस्लाम बदनाम हो रहा है । ऐसे में हम सभों की यह जिम्मदारी बनती है की हम न सिर्फ़ मुस्लमान बल्कि हिन्दुस्तानी मुस्लमान होने पर गर्व करें । एक बार फिर सभी देशवासिओं को ईद की मुबारकबाद। खुदा हमारे मुल्क को बुरी नज़रों से बचाए।

शनिवार, सितंबर 19, 2009

कांग्रेस और नेशनल लोकतान्त्रिक गठबंधन को झटका

दिल्ली की दो और बिहार की १८ सीटों के जो नतीजे आए हैं उस से एक तरफ़ जहाँ लालू प्रसाद यादव और उनके मजुदा दोस्त राम विलास पासवान को काफी लाभ हुआ है वहीँ दिल्ली में कांग्रेस और बिहार में नेशनल लोकतान्त्रिक गठबंधन को काफी नुकसान हुआ है। मध्यावधि चूनाव के नतीजे ने यह साबित कर दिया है की दिल्ली में शिला दीक्षित और बिहार में नीतिश कुमार लाख यह दावा करें की उनकी हुकूमत से जनता बहुत खुश है मगर सच्चाई क्या है इसका अंदाजा इस नतीजे से लग गया है । दिल्ली में शिला की सरकार को अभी ज्यादह दिन नहीं हुए हैं और उसे दो सीट का नुकसान हो गया इसका मतलब तो यही निकलता है की जनता को फिलहाल कांग्रेस की हुकूमत पर भरोसा नही है। दिल्ली में ओखला विधान सभा की सीट पर यहाँ के मशहूर लीडर आसिफ मोहम्मद खान की जीत बहुत खास है। पिछले चूनाव में लगभग ५०० वोट से हरने वाले आसिफ ने इस बार ५००० वोट से जीत दर्ज की । आसिफ की जीत इस कारन से भी खास है की उन्हें हराने के लिए ओखला में मौजूद मुसलमानों के कई बड़े संगठन ने उन्हें हराने के लिए चूनाव के दिन जनता से अपील की थी। शर्म की बात तो यह है की उनमें से कई अब आसिफ को उनकी जीत पर बधाई दे रहें हैं।
आसिफ उन नेताओं में से हैं जो जनता की भलाई को सब से ऊपर रखते हैं । यही कारन है की उनकी जीत पर सबसे ज्यादह खुशी ग़रीबों ने मनाई । आसिफ का एक बड़ा काम यह भी कहा जा सकता है की जीत के तुंरत बाद सबसे पहले वोह आतिफ और साजिद की कब्र पर गए जिन दोनों को उस जामिया नगर एनकाउंटर में मर गिराया गया था जिस की सच्चाई पर अब तक शक किया जा रहा है। हो सकता है की यह एनकाउंटर सही हो मगर सिर्फ़ मुस्लमान ही नही बल्कि अख़बार और दूसरे मीडिया वाले भी इस पर शक की निगाह से देख रहे हैं।
बिहार के नतीजे नीतिश कुमार को झटका देने वाले है। अलबत्ता इस नतीजे ने लालू और पासवान को ज़रूर खुश कर दिया है । खास तौर पर लालू की खुशी इस लिए जायज़ है क्यूंकि कुछ लोगो ने अब सियासत में लालू को बिल्कुल समाप्त समझ लिया था। खैर नीतिश और शिला को यह समझना होगा की यह झटका अभी छोटा है जो बाद में बढ़ भी सकता है।

कांग्रेस और एन डी इ

शनिवार, सितंबर 12, 2009

दाढ़ी से सम्बंधित सुप्रीम कोर्ट का काबिले तारीफ फ़ैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के एक विद्यार्थी मोहम्मद सलीम के सिलसिले में जो फ़ैसला सुनाया है उसकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है। ज्ञात रहे की निर्मला कॉन्वेंट स्कूल ने सलीम को स्कूल से यह कह कर निकल दिया था की यदि स्कूल में रहना है तो दाढ़ी कटनी होगी । अब कोर्ट ने कहा है की दाढ़ी रखना किसी की धार्मिक आस्था का सवाल है और उसे कटाने के लिए किसी को मजबूर नही किया जा सकता। पता नही हमारे देश में जो की विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और उसकी एक सब से बड़ी खूबी यह है की यहाँ सभी धर्म के लोग आपस में मिल कर रहते हैं इसके बावजूद कभी दाढ़ी को लेकर तो कभी दोपट्टा को लेकर यहाँ हंगामा खड़ा होता रहता है। यदि कोई लड़की दुपट्टा पहन कर स्कूल जाती है तो उसपर किसी को आपत्ति नही होनी चाहिए। इसी तरह यदि कोई व्यक्ति दाढ़ी रखना चाहता है तो यह उसका अपना मामला है इस पर भी किसी को आपत्ति नही होनी चाहिए। ऐसा नही है की दाढ़ी वाले स्टुडेंट तेज़ नही होते। भारत में दाढ़ी रखे हुए मुस्लमान बड़े बड़े ओहदों पर है और वोह अपना और देश का नाम रोशन कर रहे हैं। और वैसे भी सब से बड़ी बात धार्मिक आस्था का है यदि कोई मुस्लमान दाढ़ी रखना चाहता है तो किसी को उसे रोकने का हक नहीं है। उसी तरह यदि कोई हिंदू तिलक लगना छठा है या फिर वोह टिकी रखना चाहता है तो इस पर किसी को आपत्ति क्यों हो। यह उसकी अपनी मर्ज़ी है। जो लोग आए दिन कभी ड्रेस कोड के नाम पर तो कभी किसी और नाम पर इस तरह की बकवास करते रहते हैं उन्हें अपनी हरकतों से बाज़ आ जाना चाहिए।

रविवार, अगस्त 02, 2009

यह कैसी हिंदू मुस्लिम एकता ?

भारत की सब से बड़ी खूबी यह है की यह एकता में अनेकता वाला देश है। बच्चों को किताबों में यही पढाया जाता है की भारत देश की सब से बड़ी खूबी यह है की यहाँ कई धर्मों के लोग एक साथ मिल कर रहते है मगर क्या इमरान हाश्मी के ताज़ा मामले से ऐसा लगता है की यहाँ सभी धर्मों के लोग आपस में मिल कर रहते है। यह सच है की यहाँ ज़्यादा तर लोग ऐसे हैं जो हिंदू मुस्लिम होते हुए भी आपस में खूब मिलकर रहते हैं मगर इस से इंकार नहीं क्या जा सकता की बहुत ऐसे लोग भी हैं जो आपस में मिलकर नहीं रहना चाहते। इमरान हाश्मी के मामले में यह बात सच साबित होती है। ज़रा सोचिये इमरान हाश्मी जैसे हीरो जो की महेश भट्ट के भांजे हैं को मुंबई में सिर्फ़ इसलिए घर नहीं मिल रहा है की वोह मुस्लमान हैं तो फिर छोटे मोटे मुसलमानों को कौन पूछेगा। इमरान हाश्मी से पहले जावेद अख्तर और शबाना आज़मी जैसे स्टारों को भी यही मुश्किल पेश आ चुकी है।
जावेद अख्तर का मामला तो यह है उनके बिना फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में सोचा भी नही जा सकता। यही हाल शबाना आज़मी का भी है। एक और खास बात यह है की जो मुस्लमान पक्के है (पक्के से मतलब जो पाबन्दी से नमाज़ और रोजा रखने वाले हैं ) वोह फ़िल्म स्टारों को पक्का मुस्लमान नही समझते। अब गौर करने वाली बात ये है की जब इन नाव्हने गाने वालों को घर नही मिल रहा है तो बड़ी बड़ी दाढ़ी रखने वाले मुसलमानों को घर मिल सकेगा। सरकार को इस सिलसिले में संजीदगी से गौर कर के उन लोगों के विरूद्व करवाई करनी चाहिए। एक दूसरे से नफरत करने वाले इन लोगों को यह बात क्यों नही समझ में नही आती की वोह ऐसी सोच रख कर देश के विकास में रोकावत बन रहे हैं। देश के पूर्ण विकास के लिए सभी धर्मों के लोगों का मिल कर रहना ज़रूरी है।